न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ ३२ ॥
na kāṅkṣhe vijayaṁ kṛiṣhṇa na cha rājyaṁ sukhāni cha kiṁ no rājyena govinda kiṁ bhogair jīvitena vā
हिंदी अर्थ
हे कृष्ण! मैं न विजय चाहता हूँ, न राज्य, न सुख। हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्य से, भोगों से, या जीवन से भी क्या प्रयोजन?
भावार्थ
यह वैराग्य जैसा लगता है, और कुछ पाठक इसे वैसा ही मान लेते हैं। पर गीता आगे दिखाएगी कि अर्जुन का यह त्याग ज्ञान से नहीं, शोक से उपजा है — वे राज्य इसलिए छोड़ना चाहते हैं क्योंकि वे व्याकुल हैं, इसलिए नहीं कि उन्होंने उसके पार देख लिया है। श्रीकृष्ण सिखाएँगे कि सच्चा त्याग भीतर का होता है और उसका अर्थ अपने कर्तव्य को छोड़ना नहीं है।