Bhakti Arohan
ॐ

सुन्दरकाण्ड — दोहा 9

जुगनू और कमलिनी

दोहा 9: जुगनू और कमलिनी

रावण सीता जी को लुभाता और धमकाता है; वे तिनके की ओट से कहती हैं कि जुगनू से कमलिनी नहीं खिलती।

श्लोक 9.1

तरु पल्लव महँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥ तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥ १ ॥

taru pallava maham̐ rahā lukāī karai bichāra karauṁ kā bhāī tehi avasara rāvanu taham̐ āvā saṁga nāri bahu kiem̐ banāvā

हिंदी अर्थ

वे पेड़ के पत्तों में छिपे रहे और सोचने लगे, "भाई, अब क्या करूँ?" उसी समय रावण सज-धजकर बहुत सी स्त्रियों को साथ लेकर वहाँ आया।

श्लोक 9.2

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥ कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥ २ ॥

bahu bidhi khala sītahi samujhāvā sāma dāna bhaya bheda dekhāvā kaha rāvanu sunu sumukhi sayānī maṁdodarī ādi saba rānī

हिंदी अर्थ

दुष्ट ने सीता जी को बहुत प्रकार से समझाया। उसने साम, दान, भय और भेद, सब उपाय दिखाए। रावण बोला, "हे सुमुखी, सयानी! सुनो, मंदोदरी आदि सब रानियों को

भावार्थ

साम, दान, भेद और दंड (यहाँ भय) राजनीति के चार शास्त्रीय उपाय हैं। रावण सीता जी पर सब आज़माता है, मानो वे कोई जीतने योग्य राज्य हों, पर कोई उपाय काम नहीं करता।

श्लोक 9.3

तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥ तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥ ३ ॥

tava anucharīṁ karaum̐ pana morā eka bāra biloku mama orā tṛina dhari oṭa kahati baidehī sumiri avadhapati parama sanehī

हिंदी अर्थ

"मैं तुम्हारी दासियाँ बना दूँगा, यह मेरी प्रतिज्ञा है। बस एक बार मेरी ओर देख लो।" तब परम स्नेही अवधपति का स्मरण करके वैदेही ने तिनके की ओट करके कहा:

भावार्थ

सीता जी रावण से सीधे बात भी नहीं करतीं, बीच में एक तिनका रख देती हैं। इसका अर्थ प्रायः यह लिया जाता है कि उनके लिए रावण तिनके से अधिक नहीं, और पतिव्रता के लिए एक तिनका भी पर्याप्त रक्षा है।

श्लोक 9.4

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥ अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥ ४ ॥

sunu dasamukha khadyota prakāsā kabahum̐ ki nalinī karai bikāsā asa mana samujhu kahati jānakī khala sudhi nahiṁ raghubīra bāna kī

हिंदी अर्थ

"सुन दशमुख! क्या जुगनू के प्रकाश से कभी कमलिनी खिल सकती है?" जानकी जी कहती हैं, "मन में यह समझ ले। दुष्ट! तुझे रघुवीर के बाणों का पता नहीं।

भावार्थ

कमलिनी केवल सूर्य के प्रकाश में खिलती है। सीता जी की उपमा में रावण जुगनू है और राम सूर्य, और अगले दोहे में रावण यही अपमान समझता है।

श्लोक 9.5

सठ सूनें हरि आनेहि मोही। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥ ५ ॥

saṭha sūneṁ hari ānehi mohī adhama nilajja lāja nahiṁ tohī

हिंदी अर्थ

"अरे दुष्ट! तू मुझे सूने में हर लाया। अधम, निर्लज्ज! तुझे लज्जा नहीं आती?"

श्लोक 9.6

आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान। परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥ ९ ॥

āpuhi suni khadyota sama rāmahi bhānu samāna paruṣha bachana suni kāṛhi asi bolā ati khisiāna

हिंदी अर्थ

अपने को जुगनू के समान और राम को सूर्य के समान सुनकर, और ऐसे कठोर वचन सुनकर, वह तलवार निकालकर बड़े क्रोध में बोला:

विषय-सूची
  1. मंगलाचरण
  2. दोहा 1: समुद्र लाँघना
  3. दोहा 2: सुरसा की परीक्षा
  4. दोहा 3: लंका का प्रथम दर्शन
  5. दोहा 4: लंकिनी
  6. दोहा 5: महलों में खोज
  7. दोहा 6: विभीषण से भेंट
  8. दोहा 7: दाँतों के बीच जीभ
  9. दोहा 8: अशोक वाटिका में सीता
  10. दोहा 9: जुगनू और कमलिनी
  11. दोहा 10: चंद्रहास
  12. दोहा 11: त्रिजटा का स्वप्न
  13. दोहा 12: मुद्रिका का गिरना
  14. दोहा 13: हनुमान जी का प्रकट होना
  15. दोहा 14: क्या उन्होंने मुझे भुला दिया?
  16. दोहा 15: राम का संदेश
  17. दोहा 16: सुमेरु जैसा रूप
  18. दोहा 17: सीता जी का आशीर्वाद
  19. दोहा 18: वाटिका का विध्वंस
  20. दोहा 19: मेघनाद और ब्रह्मास्त्र
  21. दोहा 20: रावण की सभा में
  22. दोहा 21: किसके बल पर?
  23. दोहा 22: दूत की विनती
  24. दोहा 23: राम-विमुख संपत्ति
  25. दोहा 24: दूत का दंड
  26. दोहा 25: जलती पूँछ
  27. दोहा 26: लंका दहन
  28. दोहा 27: चूड़ामणि
  29. दोहा 28: वापसी
  30. दोहा 29: राम के सम्मुख
  31. दोहा 30: जाम्बवान का वर्णन
  32. दोहा 31: सीता जी के वचन
  33. दोहा 32: जिससे उऋण न हो सकें
  34. दोहा 33: सब आपका प्रताप
  35. दोहा 34: भक्ति का वरदान
  36. दोहा 35: सागर-तट की ओर कूच
  37. दोहा 36: मंदोदरी की विनती
  38. दोहा 37: चाटुकार मंत्री
  39. दोहा 38: विभीषण की सलाह
  40. दोहा 39: राम केवल राजा नहीं
  41. दोहा 40: सुमति और कुमति
  42. दोहा 41: विभीषण का निष्कासन
  43. दोहा 42: राम-चरणों की अभिलाषा
  44. दोहा 43: सुग्रीव का संदेह
  45. दोहा 44: शरणागति का प्रण
  46. दोहा 45: विभीषण राम के सम्मुख
  47. दोहा 46: आलिंगन
  48. दोहा 47: विभीषण की स्तुति
  49. दोहा 48: भक्त के लक्षण
  50. दोहा 49: विभीषण का राजतिलक
  51. दोहा 50: सागर कैसे पार हो
  52. दोहा 51: सागर के सम्मुख
  53. दोहा 52: दूत पकड़े गए
  54. दोहा 53: रावण के प्रश्न
  55. दोहा 54: शुक का वर्णन
  56. दोहा 55: स्वभाव से शूरवीर
  57. दोहा 56: लक्ष्मण जी का पत्र
  58. दोहा 57: भय बिनु होइ न प्रीति
  59. दोहा 58: अग्निबाण
  60. दोहा 59: समुद्र की शरण
  61. दोहा 60: नल-नील और समापन