श्लोक 5.1
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥ १ ॥
prabisi nagara kīje saba kājā hṛidayam̐ rākhi kosalapura rājā
garala sudhā ripu karahiṁ mitāī gopada siṁdhu anala sitalāī
हिंदी अर्थ
"नगर में प्रवेश करके अयोध्यापति को हृदय में रखकर सब काम कीजिए। उनके लिए विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर जितना हो जाता है और अग्नि शीतल हो जाती है,
भावार्थ
"प्रबिसि नगर कीजे सब काजा, हृदयँ राखि कोसलपुर राजा" बहुत से लोग कोई भी काम शुरू करने से पहले दोहराते हैं। अब भक्त बनी लंकिनी हनुमान जी को आशीर्वाद के साथ भीतर भेजती है।
श्लोक 5.2
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥ २ ॥
garuṛa sumeru renu sama tāhī rāma kṛipā kari chitavā jāhī
ati laghu rūpa dhareu hanumānā paiṭhā nagara sumiri bhagavānā
हिंदी अर्थ
"और सुमेरु पर्वत भी धूल के कण जैसा हो जाता है, जिसकी ओर राम कृपा करके देख लें।" हनुमान जी ने बहुत छोटा रूप धारण किया और भगवान का स्मरण करके नगर में प्रवेश किया।
श्लोक 5.3
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥ ३ ॥
maṁdira maṁdira prati kari sodhā dekhe jaham̐ taham̐ aganita jodhā
gayau dasānana maṁdira māhīṁ ati bichitra kahi jāta so nāhīṁ
हिंदी अर्थ
उन्होंने एक-एक महल में खोज की और जहाँ-तहाँ अनगिनत योद्धा देखे। फिर वे रावण के महल में गए, जो इतना विचित्र था कि उसका वर्णन नहीं हो सकता।
श्लोक 5.4
सयन किएँ देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥ ४ ॥
sayana kiem̐ dekhā kapi tehī maṁdira mahum̐ na dīkhi baidehī
bhavana eka puni dīkha suhāvā hari maṁdira taham̐ bhinna banāvā
हिंदी अर्थ
कपि ने रावण को सोते देखा, पर महल में वैदेही नहीं दिखीं। फिर उन्होंने एक सुंदर भवन देखा, जिसमें भगवान का मंदिर अलग से बना था।
श्लोक 5.5
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ॥ ५ ॥
rāmāyudha aṁkita gṛiha sobhā barani na jāi
nava tulasikā bṛiṁda taham̐ dekhi haraṣhi kapirāi
हिंदी अर्थ
वह भवन राम के आयुधों (धनुष-बाण) के चिह्नों से अंकित था, उसकी शोभा का वर्णन नहीं हो सकता। वहाँ तुलसी के नए-नए पौधे देखकर कपिराज प्रसन्न हो गए।
भावार्थ
दीवारों पर राम के धनुष-बाण के चिह्न और आँगन में तुलसी वैष्णव घर की पहचान हैं, जो आज भी भक्त परिवारों में दिखती है। लंका के बीच ये चिह्न हनुमान जी को बताते हैं कि यहाँ कोई भक्त रहता है।