श्लोक 44.1
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ १ ॥
koṭi bipra badha lāgahiṁ jāhū āem̐ sarana tajaum̐ nahiṁ tāhū
sanamukha hoi jīva mohi jabahīṁ janma koṭi agha nāsahiṁ tabahīṁ
हिंदी अर्थ
"जिसे करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या का पाप लगा हो, शरण में आने पर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव जब मेरे सम्मुख होता है, उसी समय उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
भावार्थ
शास्त्रों में ब्राह्मण-हत्या को सबसे बड़ा पाप माना गया है। राम जानबूझकर सबसे बुरी कल्पना चुनते हैं, यह दिखाने के लिए कि शरण किसी को मना नहीं है।
श्लोक 44.2
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥ २ ॥
pāpavaṁta kara sahaja subhāū bhajanu mora tehi bhāva na kāū
jauṁ pai duṣhṭa hṛidaya soi hoī moreṁ sanamukha āva ki soī
हिंदी अर्थ
"पापी का यह सहज स्वभाव होता है कि मेरा भजन उसे कभी अच्छा नहीं लगता। यदि वह सचमुच दुष्ट हृदय वाला होता, तो क्या मेरे सामने आता?
भावार्थ
राम का तर्क सुग्रीव के डर का उत्तर है: शरण में आना ही बदले हुए हृदय का प्रमाण है।
श्लोक 44.3
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥ ३ ॥
nirmala mana jana so mohi pāvā mohi kapaṭa chhala chhidra na bhāvā
bheda lena paṭhavā dasasīsā tabahum̐ na kachhu bhaya hāni kapīsā
हिंदी अर्थ
"निर्मल मन वाला व्यक्ति ही मुझे पाता है, मुझे कपट, छल और छिद्र (दोष ढूँढना) अच्छे नहीं लगते। और हे कपिराज! यदि रावण ने इसे भेद लेने भेजा हो, तब भी कोई भय या हानि नहीं है।
भावार्थ
"निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा" मानस की सबसे अधिक उद्धृत पंक्तियों में है, यह बताने के लिए कि भगवान भक्त से क्या चाहते हैं।
श्लोक 44.4
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
जौं सभीत आवा सरनाईं। रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥ ४ ॥
jaga mahum̐ sakhā nisāchara jete lachhimanu hanai nimiṣha mahum̐ tete
jauṁ sabhīta āvā saranāīṁ rakhihaum̐ tāhi prāna kī nāīṁ
हिंदी अर्थ
"हे मित्र! संसार में जितने राक्षस हैं, लक्ष्मण उन सबको पल भर में मार सकते हैं। और यदि वह डरकर शरण में आया है, तो मैं उसे प्राणों की तरह रखूँगा।"
श्लोक 44.5
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत॥ ४४ ॥
ubhaya bhām̐ti tehi ānahu ham̐si kaha kṛipāniketa
jaya kṛipāla kahi kapi chale aṁgada hanū sameta
हिंदी अर्थ
कृपा के धाम प्रभु ने हँसकर कहा, "दोनों ही स्थितियों में उसे ले आओ।" "कृपालु की जय हो" कहते हुए वानर अंगद और हनुमान के साथ चले।