श्लोक 3.1
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥ १ ॥
nisichari eka siṁdhu mahum̐ rahaī kari māyā nabhu ke khaga gahaī
jīva jaṁtu je gagana uṛāhīṁ jala biloki tinha kai parichhāhīṁ
हिंदी अर्थ
समुद्र में एक राक्षसी रहती थी, जो माया से आकाश में उड़ते पक्षियों को पकड़ लेती थी। आकाश में जो भी जीव-जंतु उड़ते, वह जल में उनकी परछाईं देखती,
भावार्थ
परंपरा में उसका नाम सिंहिका है (वाल्मीकि यही नाम देते हैं)। तुलसीदास नाम नहीं लेते, केवल उसकी चाल बताते हैं, जो परछाईं पकड़कर काम करती है।
श्लोक 3.2
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥ २ ॥
gahai chhāham̐ saka so na uṛāī ehi bidhi sadā gaganachara khāī
soi chhala hanūmāna kaham̐ kīnhā tāsu kapaṭu kapi turatahiṁ chīnhā
हिंदी अर्थ
और परछाईं पकड़ लेने से वे उड़ नहीं पाते थे। इस तरह वह सदा आकाशचारी जीवों को खाती थी। उसने वही छल हनुमान जी के साथ किया, और कपि ने उसका कपट तुरंत पहचान लिया।
भावार्थ
उड़ान में तीन बाधाएँ आती हैं: मैनाक सुख देना चाहता है, सुरसा परीक्षा लेती है, और यह राक्षसी सीधी दुष्टता है। हनुमान जी तीनों से अलग ढंग से निपटते हैं: शिष्टता से, चतुराई से, और बल से।
श्लोक 3.3
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥ ३ ॥
tāhi māri mārutasuta bīrā bāridhi pāra gayau matidhīrā
tahām̐ jāi dekhī bana sobhā guṁjata chaṁcharīka madhu lobhā
हिंदी अर्थ
धीर बुद्धि वाले वीर पवनपुत्र उसे मारकर समुद्र के पार चले गए। वहाँ जाकर उन्होंने वन की शोभा देखी, जहाँ भौंरे मधु के लोभ में गुंजार कर रहे थे।
श्लोक 3.4
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥ ४ ॥
nānā taru phala phūla suhāe khaga mṛiga bṛiṁda dekhi mana bhāe
saila bisāla dekhi eka āgeṁ tā para dhāi chaṛheu bhaya tyāgeṁ
हिंदी अर्थ
फल-फूलों से लदे अनेक प्रकार के सुंदर वृक्ष और पक्षियों तथा पशुओं के झुंड देखकर उनका मन प्रसन्न हो गया। सामने एक विशाल पर्वत देखकर वे निडर होकर दौड़कर उस पर चढ़ गए।
श्लोक 3.5
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥ ५ ॥
umā na kachhu kapi kai adhikāī prabhu pratāpa jo kālahi khāī
giri para chaṛhi laṁkā tehiṁ dekhī kahi na jāi ati durga biseṣhī
हिंदी अर्थ
(शिव जी कहते हैं) "हे उमा! इसमें वानर की कोई विशेष बड़ाई नहीं है, यह प्रभु का प्रताप है जो काल को भी खा जाता है।" पर्वत पर चढ़कर उन्होंने लंका देखी। वह ऐसा विशेष दुर्ग था कि उसका वर्णन नहीं हो सकता।
भावार्थ
रामचरितमानस संवाद के रूप में कही गई है, जिसमें शिव जी पार्वती (उमा) को कथा सुनाते हैं। यहाँ शिव जी बीच में याद दिलाते हैं कि हनुमान जी के पराक्रम राम के प्रताप से हैं, और हनुमान जी स्वयं भी इन्हें ऐसे ही देखते हैं।
श्लोक 3.6
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा॥ ६ ॥
ati utaṁga jalanidhi chahu pāsā kanaka koṭa kara parama prakāsā
हिंदी अर्थ
वह बहुत ऊँचा था, उसके चारों ओर समुद्र था, और सोने के परकोटे की बड़ी चमक थी।
श्लोक 3.7
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥ १ ॥
kanaka koṭa bichitra mani kṛita suṁdarāyatanā ghanā
chauhaṭṭa haṭṭa subaṭṭa bīthīṁ chāru pura bahu bidhi banā
gaja bāji khachchara nikara padachara ratha barūthanhi ko ganai
bahurūpa nisichara jūtha atibala sena baranata nahiṁ banai
हिंदी अर्थ
विचित्र मणियों से जड़ा सोने का परकोटा है, जिसके भीतर बहुत से सुंदर भवन हैं। चौराहे, बाज़ार, सुंदर मार्ग और गलियाँ हैं, नगर हर प्रकार से सुंदर बना है। हाथियों, घोड़ों, खच्चरों के झुंडों, पैदल सैनिकों और रथों के समूहों को कौन गिन सकता है? अनेक रूप वाले राक्षसों के दल और उनकी अत्यंत बलवान सेना का वर्णन नहीं हो सकता।
भावार्थ
यहाँ छंद चौपाई से बदलकर "छंद" हो जाता है, जो लंबा और अलंकृत छंद है। तुलसीदास इसका प्रयोग विशेष वर्णनों के लिए करते हैं। लंका का चित्र एक समृद्ध, सुव्यवस्थित और भारी सुरक्षा वाले नगर का है, जिससे चुनौती का आकार समझ आता है।
श्लोक 3.8
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥ २ ॥
bana bāga upabana bāṭikā sara kūpa bāpīṁ sohahīṁ
nara nāga sura gaṁdharba kanyā rūpa muni mana mohahīṁ
kahum̐ māla deha bisāla saila samāna atibala garjahīṁ
nānā akhārenha bhirahiṁ bahubidhi eka ekanha tarjahīṁ
हिंदी अर्थ
वन, बाग, उपवन, फुलवारियाँ, तालाब, कुएँ और बावड़ियाँ शोभा दे रही हैं। मनुष्य, नाग, देवता और गंधर्वों की कन्याएँ अपने रूप से मुनियों का मन भी मोह लेती हैं। कहीं पर्वत जैसे विशाल शरीर वाले अत्यंत बलवान पहलवान गरज रहे हैं, और अनेक अखाड़ों में तरह-तरह से भिड़ते और एक-दूसरे को ललकारते हैं।
भावार्थ
मनुष्य, नाग, देवता और गंधर्वों की कन्याओं का उल्लेख रावण की स्त्रियों को हर लाने की आदत की ओर संकेत करता है, और यही वह अपराध है जिसका उत्तर देने हनुमान जी आए हैं।
श्लोक 3.9
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥ ३ ॥
kari jatana bhaṭa koṭinha bikaṭa tana nagara chahum̐ disi rachchhahīṁ
kahum̐ mahiṣha mānuṣha dhenu khara aja khala nisāchara bhachchhahīṁ
ehi lāgi tulasīdāsa inha kī kathā kachhu eka hai kahī
raghubīra sara tīratha sarīranhi tyāgi gati paihahiṁ sahī
हिंदी अर्थ
करोड़ों भयानक शरीर वाले योद्धा बड़े यत्न से नगर की चारों ओर से रक्षा करते हैं। कहीं दुष्ट राक्षस भैंसे, मनुष्य, गाय, गधे और बकरे खा रहे हैं। तुलसीदास ने इनकी कथा थोड़ी-सी इसलिए कही है कि ये रघुवीर के बाण रूपी तीर्थ में शरीर छोड़कर निश्चय ही परम गति पाएँगे।
भावार्थ
एक महत्वपूर्ण भाव: तुलसीदास राक्षसों का वर्णन इसलिए करते हैं कि राम के बाण उनके लिए तीर्थ होंगे। राम के हाथों मरना मुक्ति है, इसलिए खलनायक भी मोक्ष की ओर बढ़ रहे हैं।
श्लोक 3.10
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥ ३ ॥
pura rakhavāre dekhi bahu kapi mana kīnha bichāra
ati laghu rūpa dharauṁ nisi nagara karauṁ paisāra
हिंदी अर्थ
नगर के बहुत से रखवालों को देखकर कपि ने मन में विचार किया, "मैं बहुत छोटा रूप धरकर रात में नगर में प्रवेश करूँगा।"
भावार्थ
फिर वही बात: बल से पहले बुद्धि। गुप्तचर रात में चुपचाप प्रवेश करता है।