श्लोक 12.1
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥ १ ॥
trijaṭā sana bolīṁ kara jorī mātu bipati saṁgini taiṁ morī
tajauṁ deha karu begi upāī dusaha birahu aba nahiṁ sahi jāī
हिंदी अर्थ
सीता जी हाथ जोड़कर त्रिजटा से बोलीं, "माता! तुम मेरी विपत्ति की साथी हो। जल्दी कोई उपाय करो कि मैं यह शरीर छोड़ दूँ। अब यह असहनीय विरह सहा नहीं जाता।
भावार्थ
इस काण्ड में सीता जी की कथा का यह सबसे दुखद क्षण है। वे राक्षसी को "माता" कहती हैं, जिससे पता चलता है कि त्रिजटा के सिवा वे कितनी अकेली हैं।
श्लोक 12.2
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥ २ ॥
āni kāṭha rachu chitā banāī mātu anala puni dehi lagāī
satya karahi mama prīti sayānī sunai ko śhravana sūla sama bānī
हिंदी अर्थ
"लकड़ी लाकर चिता बना दो, फिर माता, उसमें आग लगा दो। हे सयानी! मेरी प्रीति को सच्चा कर दो। कानों में शूल जैसी चुभने वाली (रावण की) बातें कौन सुने?"
श्लोक 12.3
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥ ३ ॥
sunata bachana pada gahi samujhāesi prabhu pratāpa bala sujasu sunāesi
nisi na anala mila sunu sukumārī asa kahi so nija bhavana sidhārī
हिंदी अर्थ
यह सुनकर त्रिजटा ने चरण पकड़कर उन्हें समझाया और प्रभु का प्रताप, बल और सुयश सुनाया। "हे सुकुमारी! सुनो, रात में आग नहीं मिलेगी," यह कहकर वह अपने घर चली गई।
भावार्थ
त्रिजटा का इनकार कोमल और व्यावहारिक है: वह सीता जी की निराशा से बहस नहीं करती, बस कह देती है कि रात में आग नहीं मिलेगी, और समय को अपना काम करने देती है।
श्लोक 12.4
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा॥ ४ ॥
kaha sītā bidhi bhā pratikūlā milihi na pāvaka miṭihi na sūlā
dekhiata pragaṭa gagana aṁgārā avani na āvata ekau tārā
हिंदी अर्थ
सीता जी बोलीं, "विधाता ही उलटा हो गया है। न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी। आकाश में अंगारे साफ़ दिख रहे हैं, पर धरती पर एक भी तारा नहीं आता।
भावार्थ
दुख में सीता जी तारों को जलते अंगारे देखती हैं, जो उनकी चिता जला सकते, यदि एक भी नीचे गिर जाता।
श्लोक 12.5
पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥ ५ ॥
pāvakamaya sasi sravata na āgī mānahum̐ mohi jāni hatabhāgī
sunahi binaya mama biṭapa asokā satya nāma karu haru mama sokā
हिंदी अर्थ
"चंद्रमा अग्निमय है, फिर भी आग नहीं बरसाता, मानो मुझे अभागिनी जानकर। हे अशोक वृक्ष! मेरी विनती सुन, अपना नाम सच्चा कर और मेरा शोक हर ले।
भावार्थ
अशोक का अर्थ है "शोक-रहित"। सीता जी जिस वृक्ष के नीचे बैठी हैं, उसी से विनती करती हैं कि अपना नाम सार्थक करे। भारतीय काव्य में विरही जनों को चंद्रमा शीतल नहीं, जलाने वाला लगता है, और सीता जी को भी यही अनुभव होता है।
श्लोक 12.6
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥ ६ ॥
nūtana kisalaya anala samānā dehi agini jani karahi nidānā
dekhi parama birahākula sītā so chhana kapihi kalapa sama bītā
हिंदी अर्थ
"तेरे नए कोमल पत्ते अग्नि के समान हैं। मुझे आग दे, निष्ठुर मत बन।" सीता जी को विरह से अत्यंत व्याकुल देखकर वह क्षण कपि को कल्प के समान बीता।
भावार्थ
कल्प अरबों वर्षों का ब्रह्मांडीय युग है। अशोक की नई लाल पत्तियाँ सीता जी को लपटों जैसी दिखती हैं, और उन्हें देखते हुए हनुमान जी अब प्रतीक्षा नहीं कर पाते।
श्लोक 12.7
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥ १२ ॥
kapi kari hṛidayam̐ bichāra dīnhi mudrikā ḍāri taba
janu asoka aṁgāra dīnha haraṣhi uṭhi kara gaheu
हिंदी अर्थ
कपि ने मन में विचार करके तब अँगूठी नीचे डाल दी। मानो अशोक ने अंगारा दे दिया हो, सीता जी ने हर्षित होकर उठकर उसे हाथ में ले लिया।
भावार्थ
यह सोरठा है, यानी ऐसा दोहा जिसके चरण उलट दिए गए हों। चमकती अँगूठी ठीक तब गिरती है जब सीता जी वृक्ष से आग माँग रही हैं, इसलिए वे उसे वृक्ष का उत्तर मानती हैं: एक चिनगारी, पर मृत्यु की नहीं, आशा की।