श्लोक 15.1
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥ १ ॥
kaheu rāma biyoga tava sītā mo kahum̐ sakala bhae biparītā
nava taru kisalaya manahum̐ kṛisānū kālanisā sama nisi sasi bhānū
हिंदी अर्थ
"राम ने कहा है: 'हे सीता! तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सब कुछ उलटा हो गया है। पेड़ों के नए पत्ते मानो अग्नि हैं, रात कालरात्रि जैसी है, और चंद्रमा सूर्य जैसा।
भावार्थ
राम का संदेश ठीक वही है जो सीता जी ने दोहा 12 में अशोक वृक्ष से कहा था: नए पत्ते आग जैसे, चंद्रमा जलाने वाला। बिछुड़े हुए दोनों प्रेमी अनजाने में एक-सा ही अनुभव कर रहे हैं।
श्लोक 15.2
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥ २ ॥
kubalaya bipina kuṁta bana sarisā bārida tapata tela janu barisā
je hita rahe karata tei pīrā uraga svāsa sama tribidha samīrā
हिंदी अर्थ
"'कमलों के वन भालों के वन जैसे हैं, बादल मानो खौलता तेल बरसाते हैं। जो सुख देते थे वे ही पीड़ा देने लगे हैं, और शीतल, मंद, सुगंधित पवन साँप की साँस जैसा लगता है।
भावार्थ
त्रिबिध समीर यानी शीतल, मंद और सुगंधित पवन, भारतीय काव्य की सुखद हवा है। विरह में हर सुखद चीज़ अपने उलटे रूप में बदल जाती है।
श्लोक 15.3
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥ ३ ॥
kahehū teṁ kachhu dukha ghaṭi hoī kāhi kahauṁ yaha jāna na koī
tatva prema kara mama aru torā jānata priyā eku manu morā
हिंदी अर्थ
"'कहने से दुख कुछ कम होता है, पर किससे कहूँ? यह कोई नहीं जानता। हे प्रिये! मेरे और तुम्हारे प्रेम का तत्व केवल मेरा मन जानता है,
श्लोक 15.4
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥ ४ ॥
so manu sadā rahata tohi pāhīṁ jānu prīti rasu etanehi māhīṁ
prabhu saṁdesu sunata baidehī magana prema tana sudhi nahiṁ tehī
हिंदी अर्थ
"'और वह मन सदा तुम्हारे पास रहता है। प्रेम का सारा रस बस इतने में समझ लो।'" प्रभु का संदेश सुनते ही वैदेही प्रेम में ऐसी मग्न हो गईं कि उन्हें शरीर की सुध न रही।
भावार्थ
संदेश अपनी सबसे सरल और आत्मीय पंक्ति पर समाप्त होता है: मेरा मन सदा तुम्हारे पास है। मानस में परमेश्वर राम यहाँ केवल अपनी पत्नी को याद करते पति के रूप में बोलते हैं।
श्लोक 15.5
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥ ५ ॥
kaha kapi hṛidayam̐ dhīra dharu mātā sumiru rāma sevaka sukhadātā
ura ānahu raghupati prabhutāī suni mama bachana tajahu kadarāī
हिंदी अर्थ
कपि बोले, "हे माता! हृदय में धीरज धरिए। सेवकों को सुख देने वाले राम का स्मरण कीजिए। श्री रघुनाथ जी की प्रभुता को हृदय में लाइए, और मेरी बात सुनकर कायरता छोड़ दीजिए।
श्लोक 15.6
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥ १५ ॥
nisichara nikara pataṁga sama raghupati bāna kṛisānu
jananī hṛidayam̐ dhīra dharu jare nisāchara jānu
हिंदी अर्थ
"राक्षसों के समूह पतंगों जैसे हैं और श्री रघुनाथ जी के बाण अग्नि जैसे। हे माता! हृदय में धीरज धरिए, राक्षसों को जला हुआ ही समझिए।"