Bhakti Arohan
ॐ

सुन्दरकाण्ड — दोहा 35

सागर-तट की ओर कूच

दोहा 35: सागर-तट की ओर कूच

सेना के कूच से धरती काँपती है; शकुन सीता जी के लिए शुभ और रावण के लिए अशुभ होते हैं।

श्लोक 35.1

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गर्जहिं भालु महाबल कीसा॥ देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥ १ ॥

prabhu pada paṁkaja nāvahiṁ sīsā garjahiṁ bhālu mahābala kīsā dekhī rāma sakala kapi senā chitai kṛipā kari rājiva nainā

हिंदी अर्थ

वे प्रभु के चरणकमलों में सिर नवाते हैं, महाबली भालू और वानर गरजते हैं। राम ने वानरों की सारी सेना देखी और कमल-नयनों से कृपा करके उसकी ओर निहारा।

श्लोक 35.2

राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥ हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥ २ ॥

rāma kṛipā bala pāi kapiṁdā bhae pachchhajuta manahum̐ giriṁdā haraṣhi rāma taba kīnha payānā saguna bhae suṁdara subha nānā

हिंदी अर्थ

राम की कृपा का बल पाकर श्रेष्ठ वानर मानो पंख वाले पर्वत बन गए। तब राम ने हर्षित होकर प्रस्थान किया, और अनेक सुंदर शुभ शकुन हुए।

भावार्थ

पौराणिक कथा के अनुसार पहले पर्वतों के पंख होते थे, जिन्हें इंद्र ने काट दिया। राम की कृपा-दृष्टि वानर सेना को मानो वे पंख लौटा देती है।

श्लोक 35.3

जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥ प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥ ३ ॥

jāsu sakala maṁgalamaya kītī tāsu payāna saguna yaha nītī prabhu payāna jānā baidehīṁ pharaki bāma am̐ga janu kahi dehīṁ

हिंदी अर्थ

जिनकी कीर्ति सब मंगलों से भरी है, उनके प्रस्थान पर शुभ शकुन होना स्वाभाविक ही है। वैदेही ने प्रभु का प्रस्थान जान लिया, उनके बाएँ अंग फड़ककर मानो बता रहे थे।

भावार्थ

पारंपरिक मान्यता में स्त्री के बाएँ अंग का फड़कना शुभ और पुरुष के लिए अशुभ माना जाता है। अगली चौपाई इसी का उपयोग करती है।

श्लोक 35.4

जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहिं सोई॥ चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहिं बानर भालु अपारा॥ ४ ॥

joi joi saguna jānakihi hoī asaguna bhayau rāvanahiṁ soī chalā kaṭaku ko baranaiṁ pārā garjahiṁ bānara bhālu apārā

हिंदी अर्थ

जो-जो शकुन जानकी जी को शुभ हुए, वही रावण के लिए अपशकुन हुए। सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता है? असंख्य वानर और भालू गरज रहे हैं।

श्लोक 35.5

नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥ केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥ ५ ॥

nakha āyudha giri pādapadhārī chale gagana mahi ichchhāchārī keharināda bhālu kapi karahīṁ ḍagamagāhiṁ diggaja chikkarahīṁ

हिंदी अर्थ

नख ही उनके हथियार हैं, पर्वत और पेड़ धारण किए हुए, इच्छानुसार आकाश और धरती पर चलते हुए भालू और वानर सिंहनाद कर रहे हैं। दिशाओं के हाथी डगमगाते और चिंघाड़ते हैं।

श्लोक 35.6

चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे। मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥ कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं। जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥ १ ॥

chikkarahiṁ diggaja ḍola mahi giri lola sāgara kharabhare mana haraṣha sabha gaṁdharba sura muni nāga kiṁnara dukha ṭare kaṭakaṭahiṁ markaṭa bikaṭa bhaṭa bahu koṭi koṭinha dhāvahīṁ jaya rāma prabala pratāpa kosalanātha guna gana gāvahīṁ

हिंदी अर्थ

दिग्गज चिंघाड़ते हैं, धरती डोलती है, पर्वत काँपते हैं और समुद्र खलबला उठते हैं। गंधर्व, देवता, मुनि, नाग और किन्नर मन में प्रसन्न हैं कि अब दुख टल गए। करोड़ों भयंकर वानर योद्धा दाँत कटकटाते हुए दौड़ रहे हैं और "जय राम" कहकर प्रबल प्रताप वाले कोसलनाथ के गुण गा रहे हैं।

भावार्थ

काण्ड का दूसरा छंद-प्रसंग सेना के कूच का है, उसी भव्य छंद में जिसमें दोहा 3 में लंका का वर्णन हुआ था।

श्लोक 35.7

सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई। गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ठ कठोर सो किमि सोहई॥ रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी। जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥ २ ॥

sahi saka na bhāra udāra ahipati bāra bārahiṁ mohaī gaha dasana puni puni kamaṭha pṛiṣhṭha kaṭhora so kimi sohaī raghubīra ruchira prayāna prasthiti jāni parama suhāvanī janu kamaṭha kharpara sarparāja so likhata abichala pāvanī

हिंदी अर्थ

उदार शेषनाग भार नहीं सह पाते, बार-बार मूर्छित हो जाते हैं, और बार-बार कच्छप की कठोर पीठ को दाँतों से पकड़ लेते हैं, वह कैसी शोभा देता है! मानो रघुवीर के सुंदर प्रस्थान को परम मंगलमय जानकर सर्पराज कच्छप की पीठ पर उसकी पवित्र, अमिट गाथा लिख रहे हों।

भावार्थ

हिंदू ब्रह्मांड-विज्ञान में पृथ्वी शेषनाग पर टिकी है, और शेषनाग कच्छप (कूर्म) पर। तुलसीदास शेषनाग की पीड़ा को एक सुंदर कल्पना बना देते हैं: कच्छप की पीठ पर उनके दाँतों के निशान मानो राम के प्रस्थान का अमिट शिलालेख हैं।

श्लोक 35.8

एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर। जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥ ३५ ॥

ehi bidhi jāi kṛipānidhi utare sāgara tīra jaham̐ taham̐ lāge khāna phala bhālu bipula kapi bīra

हिंदी अर्थ

इस प्रकार कृपानिधान जाकर समुद्र के किनारे ठहरे, और जहाँ-तहाँ बहुत से भालू और वानर वीर फल खाने लगे।

विषय-सूची
  1. मंगलाचरण
  2. दोहा 1: समुद्र लाँघना
  3. दोहा 2: सुरसा की परीक्षा
  4. दोहा 3: लंका का प्रथम दर्शन
  5. दोहा 4: लंकिनी
  6. दोहा 5: महलों में खोज
  7. दोहा 6: विभीषण से भेंट
  8. दोहा 7: दाँतों के बीच जीभ
  9. दोहा 8: अशोक वाटिका में सीता
  10. दोहा 9: जुगनू और कमलिनी
  11. दोहा 10: चंद्रहास
  12. दोहा 11: त्रिजटा का स्वप्न
  13. दोहा 12: मुद्रिका का गिरना
  14. दोहा 13: हनुमान जी का प्रकट होना
  15. दोहा 14: क्या उन्होंने मुझे भुला दिया?
  16. दोहा 15: राम का संदेश
  17. दोहा 16: सुमेरु जैसा रूप
  18. दोहा 17: सीता जी का आशीर्वाद
  19. दोहा 18: वाटिका का विध्वंस
  20. दोहा 19: मेघनाद और ब्रह्मास्त्र
  21. दोहा 20: रावण की सभा में
  22. दोहा 21: किसके बल पर?
  23. दोहा 22: दूत की विनती
  24. दोहा 23: राम-विमुख संपत्ति
  25. दोहा 24: दूत का दंड
  26. दोहा 25: जलती पूँछ
  27. दोहा 26: लंका दहन
  28. दोहा 27: चूड़ामणि
  29. दोहा 28: वापसी
  30. दोहा 29: राम के सम्मुख
  31. दोहा 30: जाम्बवान का वर्णन
  32. दोहा 31: सीता जी के वचन
  33. दोहा 32: जिससे उऋण न हो सकें
  34. दोहा 33: सब आपका प्रताप
  35. दोहा 34: भक्ति का वरदान
  36. दोहा 35: सागर-तट की ओर कूच
  37. दोहा 36: मंदोदरी की विनती
  38. दोहा 37: चाटुकार मंत्री
  39. दोहा 38: विभीषण की सलाह
  40. दोहा 39: राम केवल राजा नहीं
  41. दोहा 40: सुमति और कुमति
  42. दोहा 41: विभीषण का निष्कासन
  43. दोहा 42: राम-चरणों की अभिलाषा
  44. दोहा 43: सुग्रीव का संदेह
  45. दोहा 44: शरणागति का प्रण
  46. दोहा 45: विभीषण राम के सम्मुख
  47. दोहा 46: आलिंगन
  48. दोहा 47: विभीषण की स्तुति
  49. दोहा 48: भक्त के लक्षण
  50. दोहा 49: विभीषण का राजतिलक
  51. दोहा 50: सागर कैसे पार हो
  52. दोहा 51: सागर के सम्मुख
  53. दोहा 52: दूत पकड़े गए
  54. दोहा 53: रावण के प्रश्न
  55. दोहा 54: शुक का वर्णन
  56. दोहा 55: स्वभाव से शूरवीर
  57. दोहा 56: लक्ष्मण जी का पत्र
  58. दोहा 57: भय बिनु होइ न प्रीति
  59. दोहा 58: अग्निबाण
  60. दोहा 59: समुद्र की शरण
  61. दोहा 60: नल-नील और समापन