श्लोक 59.1
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥ १ ॥
sabhaya siṁdhu gahi pada prabhu kere chhamahu nātha saba avaguna mere
gagana samīra anala jala dharanī inha kai nātha sahaja jaṛa karanī
हिंदी अर्थ
डरे हुए समुद्र ने प्रभु के चरण पकड़कर कहा, "हे नाथ! मेरे सब अवगुण क्षमा कीजिए। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी, इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है।
भावार्थ
समुद्र एक दार्शनिक सफ़ाई देता है: पाँचों तत्व जड़ हैं, जो केवल अपने स्वभाव के अनुसार चल सकते हैं। वह राम के कहने पर न हटने के लिए क्षमा माँग रहा है।
श्लोक 59.2
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥ २ ॥
tava prerita māyām̐ upajāe sṛiṣhṭi hetu saba graṁthani gāe
prabhu āyasu jehi kaham̐ jasa ahaī so tehi bhām̐ti raheṁ sukha lahaī
हिंदी अर्थ
"सब ग्रंथ यही गाते हैं कि आपकी प्रेरणा से माया ने सृष्टि के लिए इन्हें उत्पन्न किया है। जिसके लिए प्रभु की जैसी आज्ञा है, वह उसी प्रकार रहने में सुख पाता है।
श्लोक 59.3
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥ ३ ॥
prabhu bhala kīnha mohi sikha dīnhīṁ marajādā puni tumharī kīnhīṁ
ḍhola gavām̐ra sūdra pasu nārī sakala tāṛanā ke adhikārī
हिंदी अर्थ
"प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी, पर मेरी मर्यादा भी आपकी ही बनाई हुई है। ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री, ये सब ताड़ना के अधिकारी हैं।"
भावार्थ
यह रामचरितमानस की सबसे अधिक विवादित पंक्ति है। तीन बातें जानने योग्य हैं। पहली, यह बात समुद्र कहता है, जो अभी-अभी दंडित हुआ है और अपनी जड़ता की सफ़ाई दे रहा है; यह राम या तुलसीदास का अपना कथन नहीं है। दूसरी, "ताड़ना" के अर्थ पर मतभेद है: प्रचलित अर्थ "मारना" या "दंड देना" है, जबकि कुछ लोग इसे "देखरेख करना" या "समझना" मानते हैं, और कुछ संस्करणों में पाठभेद भी बताए जाते हैं। तीसरी, आज बहुत से पाठक और आचार्य प्रचलित अर्थ में इस पंक्ति को अस्वीकार्य मानते हैं। हमने किसी एक पक्ष में निर्णय देने के बजाय इस शब्द को ज्यों का त्यों रखा है।
श्लोक 59.4
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥ ४ ॥
prabhu pratāpa maiṁ jāba sukhāī utarihi kaṭaku na mori baṛāī
prabhu agyā apela śhruti gāī karauṁ so begi jo tumhahi sohāī
हिंदी अर्थ
"प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जाएगी, पर इसमें मेरी बड़ाई नहीं है। फिर भी वेद कहते हैं कि प्रभु की आज्ञा टाली नहीं जा सकती। आपको जो अच्छा लगे, मैं वही तुरंत करूँ।"
श्लोक 59.5
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥ ५९ ॥
sunata binīta bachana ati kaha kṛipāla musukāi
jehi bidhi utarai kapi kaṭaku tāta so kahahu upāi
हिंदी अर्थ
अत्यंत विनीत वचन सुनकर कृपालु प्रभु मुस्कुराकर बोले, "हे तात! जिस प्रकार वानर सेना पार उतरे, वह उपाय बताओ।"