श्लोक 49.1
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥ १ ॥
sunu laṁkesa sakala guna toreṁ tāteṁ tumha atisaya priya moreṁ
rāma bachana suni bānara jūthā sakala kahahiṁ jaya kṛipā barūthā
हिंदी अर्थ
"हे लंकेश! सुनो, तुममें सब गुण हैं, इसी से तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो।" राम के वचन सुनकर वानरों के सब झुंड कहने लगे, "कृपा के समूह की जय हो!"
श्लोक 49.2
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥ २ ॥
sunata bibhīṣhanu prabhu kai bānī nahiṁ aghāta śhravanāmṛita jānī
pada aṁbuja gahi bārahiṁ bārā hṛidayam̐ samāta na premu apārā
हिंदी अर्थ
प्रभु की वाणी सुनते हुए विभीषण उसे कानों के लिए अमृत जानकर अघाते नहीं थे। वे बार-बार चरणकमल पकड़ते थे, हृदय में अपार प्रेम समाता नहीं था।
श्लोक 49.3
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥ ३ ॥
sunahu deva sacharāchara svāmī pranatapāla ura aṁtarajāmī
ura kachhu prathama bāsanā rahī prabhu pada prīti sarita so bahī
हिंदी अर्थ
"हे देव! हे चराचर जगत के स्वामी! हे शरणागत के रक्षक! हे सबके हृदय के भीतर की जानने वाले! सुनिए, मेरे मन में पहले कुछ वासना थी, पर वह प्रभु के चरणों की प्रीति रूपी नदी में बह गई।
भावार्थ
विभीषण ईमानदार हैं: वे मानते हैं कि उनके मन में कोई इच्छा थी, शायद राज्य की। राम से मिलकर वह इच्छा बह गई।
श्लोक 49.4
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥ ४ ॥
aba kṛipāla nija bhagati pāvanī dehu sadā siva mana bhāvanī
evamastu kahi prabhu ranadhīrā māgā turata siṁdhu kara nīrā
हिंदी अर्थ
"हे कृपालु! अब मुझे अपनी पवित्र करने वाली भक्ति दीजिए, जो शिव जी के मन को सदा प्रिय है।" "एवमस्तु" कहकर रणधीर प्रभु ने तुरंत समुद्र का जल माँगा।
श्लोक 49.5
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥ ५ ॥
jadapi sakhā tava ichchhā nāhīṁ mora darasu amogha jaga māhīṁ
asa kahi rāma tilaka tehi sārā sumana bṛiṣhṭi nabha bhaī apārā
हिंदी अर्थ
"हे मित्र! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं है, फिर भी जगत में मेरा दर्शन अमोघ है (कभी निष्फल नहीं जाता)।" यह कहकर राम ने उनका राजतिलक कर दिया, और आकाश से फूलों की अपार वर्षा हुई।
भावार्थ
एक भी युद्ध होने से पहले ही राम समुद्र के जल से विभीषण का लंका के राजा के रूप में तिलक कर देते हैं। वे युद्ध के परिणाम को पहले से निश्चित मानते हैं।
श्लोक 49.6
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥ ४९ (क) ॥
rāvana krodha anala nija svāsa samīra prachaṁḍa
jarata bibhīṣhanu rākheu dīnheu rāju akhaṁḍa
हिंदी अर्थ
रावण की क्रोध रूपी अग्नि में, जो उसकी अपनी साँस रूपी प्रचंड हवा से भड़क रही थी, जलते हुए विभीषण की उन्होंने रक्षा की और उन्हें अखंड राज्य दिया।
श्लोक 49.7
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ॥ ४९ (ख) ॥
jo saṁpati siva rāvanahi dīnhi diem̐ dasa mātha
soi saṁpadā bibhīṣhanahi sakuchi dīnhi raghunātha
हिंदी अर्थ
जो संपत्ति शिव जी ने रावण को उसके दसों सिर चढ़ाने पर दी थी, वही संपत्ति श्री रघुनाथ जी ने विभीषण को सकुचाते हुए दी।
भावार्थ
प्रसिद्ध कथा है कि रावण ने अपने सिर काटकर शिव जी को चढ़ाए और तब शक्ति पाई। जो रावण को दस सिर देकर मिला, वही राम विभीषण को सहज दे देते हैं, और उन्हें संकोच भी होता है (सकुचि) कि भेंट इतनी छोटी है।