श्लोक 13.1
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥ १ ॥
taba dekhī mudrikā manohara rāma nāma aṁkita ati suṁdara
chakita chitava mudarī pahichānī haraṣha biṣhāda hṛidayam̐ akulānī
हिंदी अर्थ
तब उन्होंने अँगूठी देखी, जो मनोहर और अत्यंत सुंदर थी और जिस पर राम नाम अंकित था। वे चकित होकर देखने लगीं और अँगूठी पहचान ली। हृदय हर्ष और विषाद से व्याकुल हो उठा।
श्लोक 13.2
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥ २ ॥
jīti ko sakai ajaya raghurāī māyā teṁ asi rachi nahiṁ jāī
sītā mana bichāra kara nānā madhura bachana boleu hanumānā
हिंदी अर्थ
"अजेय रघुनाथ जी को कौन जीत सकता है? और माया से ऐसी अँगूठी बनाई नहीं जा सकती।" सीता जी मन में तरह-तरह के विचार करने लगीं, तब हनुमान जी मधुर वचन बोले।
भावार्थ
सीता जी सोच-समझकर तर्क करती हैं: अँगूठी पराजित राम से छीनी नहीं जा सकती, और यह राक्षसी माया भी नहीं हो सकती। उनकी सावधानी उचित है, क्योंकि रावण पहले भी वेश बदलकर ही आया था।
श्लोक 13.3
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥ ३ ॥
rāmachaṁdra guna baranaiṁ lāgā sunatahiṁ sītā kara dukha bhāgā
lāgīṁ sunaiṁ śhravana mana lāī ādihu teṁ saba kathā sunāī
हिंदी अर्थ
वे श्री रामचंद्र जी के गुणों का वर्णन करने लगे, जिसे सुनते ही सीता जी का दुख भाग गया। वे कान और मन लगाकर सुनने लगीं, और हनुमान जी ने आरंभ से सारी कथा सुनाई।
भावार्थ
हनुमान जी पहले अपना परिचय नहीं देते। वे राम की बातें करके सीता जी का विश्वास जीतते हैं, जिससे सीता जी स्वयं समझ लेती हैं कि यह अदृश्य आवाज़ किसी मित्र की है।
श्लोक 13.4
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किन भाई॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥ ४ ॥
śhravanāmṛita jehiṁ kathā suhāī kahī so pragaṭa hoti kina bhāī
taba hanumaṁta nikaṭa chali gayaū phiri baiṭhīṁ mana bisamaya bhayaū
हिंदी अर्थ
"जिसने कानों को अमृत जैसी यह सुंदर कथा सुनाई, वह भाई प्रकट क्यों नहीं होता?" तब हनुमान जी पास चले गए। उन्हें देखकर सीता जी मुँह फेरकर बैठ गईं, उनके मन में आश्चर्य हुआ।
श्लोक 13.5
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥ ५ ॥
rāma dūta maiṁ mātu jānakī satya sapatha karunānidhāna kī
yaha mudrikā mātu maiṁ ānī dīnhi rāma tumha kaham̐ sahidānī
हिंदी अर्थ
"हे माता जानकी! मैं राम का दूत हूँ, करुणानिधान की सच्ची शपथ करता हूँ। माता! यह अँगूठी मैं लाया हूँ, इसे राम ने आपके लिए पहचान के रूप में दिया था।"
भावार्थ
सहिदानी यानी पहचान का चिह्न। किष्किन्धाकाण्ड में राम ने यह अँगूठी हनुमान जी को ही दी थी, इस भरोसे से कि सब खोजने वालों में यही सीता जी तक पहुँचेंगे।
श्लोक 13.6
नर बानरहि संग कहु कैसें। कही कथा भइ संगति जैसें॥ ६ ॥
nara bānarahi saṁga kahu kaiseṁ kahī kathā bhai saṁgati jaiseṁ
हिंदी अर्थ
"बताओ, मनुष्यों और वानरों का साथ कैसे हुआ?" तब हनुमान जी ने वह कथा सुनाई कि यह मित्रता कैसे हुई।
श्लोक 13.7
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥ १३ ॥
kapi ke bachana saprema suni upajā mana bisvāsa
jānā mana krama bachana yaha kṛipāsiṁdhu kara dāsa
हिंदी अर्थ
कपि के प्रेम भरे वचन सुनकर उनके मन में विश्वास उत्पन्न हुआ। उन्होंने जान लिया कि यह मन, कर्म और वचन से कृपासागर का दास है।
भावार्थ
मन, क्रम, बचन तुलसीदास का प्रिय पद है, जो पूर्ण सच्चाई को दर्शाता है। सीता जी का विश्वास केवल अँगूठी पर नहीं, उस प्रेम पर टिका है जो उन्हें हनुमान जी की वाणी में सुनाई देता है।