श्लोक 33.1
बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥ १ ॥
bāra bāra prabhu chahai uṭhāvā prema magana tehi uṭhaba na bhāvā
prabhu kara paṁkaja kapi keṁ sīsā sumiri so dasā magana gaurīsā
हिंदी अर्थ
प्रभु बार-बार उन्हें उठाना चाहते हैं, पर प्रेम में मग्न हनुमान जी को उठना अच्छा नहीं लगता। प्रभु का करकमल कपि के सिर पर है, उस दशा का स्मरण करके गौरीपति शिव जी भी मग्न हो गए।
भावार्थ
कथा कहने वाले स्वयं भाव-विभोर हो जाते हैं: शिव जी हनुमान जी के सिर पर राम के हाथ की याद आते ही बीच में रुक जाते हैं। (परंपरा में हनुमान जी स्वयं शिव के अवतार माने जाते हैं, जिससे इसमें एक और अर्थ जुड़ जाता है।)
श्लोक 33.2
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥
कपि उठाई प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा॥ २ ॥
sāvadhāna mana kari puni saṁkara lāge kahana kathā ati suṁdara
kapi uṭhāī prabhu hṛidayam̐ lagāvā kara gahi parama nikaṭa baiṭhāvā
हिंदी अर्थ
फिर मन को सावधान करके शंकर जी अत्यंत सुंदर कथा कहने लगे। प्रभु ने कपि को उठाकर हृदय से लगाया और हाथ पकड़कर अपने बिल्कुल पास बैठा लिया।
श्लोक 33.3
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥ ३ ॥
kahu kapi rāvana pālita laṁkā kehi bidhi daheu durga ati baṁkā
prabhu prasanna jānā hanumānā bolā bachana bigata abhimānā
हिंदी अर्थ
"हे कपि! बताओ, रावण के द्वारा रक्षित लंका जैसे अत्यंत दुर्गम किले को तुमने कैसे जलाया?" प्रभु को प्रसन्न जानकर हनुमान जी अभिमान रहित होकर बोले:
श्लोक 33.4
साखामृग कै बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥ ४ ॥
sākhāmṛiga kai baṛi manusāī sākhā teṁ sākhā para jāī
nāghi siṁdhu hāṭakapura jārā nisichara gana badhi bipina ujārā
हिंदी अर्थ
"बंदर का बस यही बड़ा पुरुषार्थ है कि वह एक डाल से दूसरी डाल पर चला जाता है। मैंने जो समुद्र लाँघकर सोने का नगर जलाया और राक्षसों को मारकर वन उजाड़ा,
भावार्थ
हनुमान जी अपने कामों का वर्णन हल्के आत्म-परिहास से करते हैं: समुद्र लाँघना भी डालों पर कूदने का ही बड़ा रूप है, जो हर बंदर करता है।
श्लोक 33.5
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥ ५ ॥
so saba tava pratāpa raghurāī nātha na kachhū mori prabhutāī
हिंदी अर्थ
"वह सब हे रघुनाथ जी! आपका ही प्रताप है। हे नाथ! इसमें मेरी कुछ भी प्रभुता नहीं।"
श्लोक 33.6
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।
तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥ ३३ ॥
tā kahum̐ prabhu kachhu agama nahiṁ jā para tumha anukūla
tava prabhāvam̐ baṛavānalahi jāri sakai khalu tūla
हिंदी अर्थ
"हे प्रभु! जिस पर आप प्रसन्न हों, उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं है। आपके प्रभाव से रुई भी बड़वानल को निश्चय ही जला सकती है।"
भावार्थ
बड़वानल समुद्र के भीतर जलने वाली पौराणिक आग है, जो समुद्र का जल पीती रहती है और कभी बुझती नहीं। सामान्यतः आग रुई को जलाती है, पर राम की कृपा से रुई आग को जला देती है। यह 16.6 की साँप और गरुड़ वाली उपमा जैसी ही है।