श्लोक 4.1
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥ १ ॥
masaka samāna rūpa kapi dharī laṁkahi chaleu sumiri naraharī
nāma laṁkinī eka nisicharī so kaha chalesi mohi niṁdarī
हिंदी अर्थ
मच्छर के समान छोटा रूप धरकर, नरसिंह रूप धारण करने वाले भगवान का स्मरण करके, कपि लंका की ओर चले। लंकिनी नाम की एक राक्षसी बोली, "मेरा निरादर करके कहाँ चला?
भावार्थ
नरहरि यानी नरसिंह भगवान, जिन्होंने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी। लंकिनी नगर की रक्षिका है, मानो स्वयं लंका का रूप।
श्लोक 4.2
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥ २ ॥
jānehi nahīṁ maramu saṭha morā mora ahāra jahām̐ lagi chorā
muṭhikā eka mahā kapi hanī rudhira bamata dharanīṁ ḍhanamanī
हिंदी अर्थ
"मूर्ख! तू मेरा भेद नहीं जानता? जितने चोर यहाँ हैं, सब मेरा भोजन हैं।" महाकपि ने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खून उगलती हुई धरती पर लुढ़क पड़ी।
श्लोक 4.3
पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥ ३ ॥
puni saṁbhāri uṭhī so laṁkā jori pāni kara binaya sasaṁkā
jaba rāvanahi brahma bara dīnhā chalata biraṁchi kahā mohi chīnhā
हिंदी अर्थ
फिर वह लंकिनी सँभलकर उठी और डरते-डरते हाथ जोड़कर विनती करने लगी, "जब ब्रह्मा जी ने रावण को वर दिया था, तब जाते समय उन्होंने मुझे एक पहचान बताई थी:
श्लोक 4.4
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥ ४ ॥
bikala hosi taiṁ kapi keṁ māre taba jānesu nisichara saṁghāre
tāta mora ati punya bahūtā dekheum̐ nayana rāma kara dūtā
हिंदी अर्थ
"'जब तू वानर के मारने से व्याकुल हो जाए, तब समझ लेना कि राक्षसों का संहार होने वाला है।' हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं कि मैंने अपनी आँखों से राम के दूत को देखा।
भावार्थ
एक घूँसा लंकिनी को पहरेदार से भक्त बना देता है। मानस में राम के दूत का क्षणिक संपर्क भी किसी को बदल सकता है, और वह इस भेंट को अपने पुण्यों का फल मानती है।
श्लोक 4.5
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥ ४ ॥
tāta svarga apabarga sukha dharia tulā eka aṁga
tūla na tāhi sakala mili jo sukha lava satasaṁga
हिंदी अर्थ
"हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर उस सुख के बराबर नहीं होते जो क्षण भर के सत्संग से मिलता है।"
भावार्थ
सुन्दरकाण्ड के प्रसिद्ध दोहों में से एक, और आश्चर्य की बात है कि यह एक राक्षसी के मुख से आता है। सत्संग यानी सज्जनों का साथ, मोक्ष (अपवर्ग) से भी ऊपर रखा गया है। यह तुलसीदास की भक्ति का विशेष भाव है।