श्लोक 17.1
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥
आसिष दीन्हि राम प्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥ १ ॥
mana saṁtoṣha sunata kapi bānī bhagati pratāpa teja bala sānī
āsiṣha dīnhi rāma priya jānā hohu tāta bala sīla nidhānā
हिंदी अर्थ
कपि की भक्ति, प्रताप, तेज और बल से भरी बात सुनकर सीता जी के मन को संतोष हुआ। उन्हें राम का प्रिय जानकर आशीर्वाद दिया, "हे तात! तुम बल और शील के भंडार बनो।
श्लोक 17.2
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥ २ ॥
ajara amara gunanidhi suta hohū karahum̐ bahuta raghunāyaka chhohū
karahum̐ kṛipā prabhu asa suni kānā nirbhara prema magana hanumānā
हिंदी अर्थ
"हे पुत्र! तुम अजर, अमर और गुणों के खज़ाने बनो, रघुनायक तुम पर बहुत स्नेह करें।" "प्रभु कृपा करें", यह कानों से सुनते ही हनुमान जी पूर्ण प्रेम में मग्न हो गए।
भावार्थ
सीता जी का "अजर अमर" होने का आशीर्वाद ही इस मान्यता का आधार है कि हनुमान जी चिरंजीवी हैं और आज भी पृथ्वी पर हैं। फिर भी जो बात उन्हें सबसे अधिक भाव-विभोर करती है, वह है "प्रभु कृपा करें"।
श्लोक 17.3
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥ ३ ॥
bāra bāra nāesi pada sīsā bolā bachana jori kara kīsā
aba kṛitakṛitya bhayaum̐ maiṁ mātā āsiṣha tava amogha bikhyātā
हिंदी अर्थ
उन्होंने बार-बार चरणों में सिर नवाया और हाथ जोड़कर बोले, "हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया। आपका आशीर्वाद अमोघ है, यह सब जानते हैं।
श्लोक 17.4
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥ ४ ॥
sunahu mātu mohi atisaya bhūkhā lāgi dekhi suṁdara phala rūkhā
sunu suta karahiṁ bipina rakhavārī parama subhaṭa rajanīchara bhārī
हिंदी अर्थ
"माता, सुनिए! इन पेड़ों पर सुंदर फल देखकर मुझे बहुत भूख लग आई है।" "हे पुत्र, सुनो! इस वन की रखवाली बड़े-बड़े बलवान राक्षस योद्धा करते हैं।"
भावार्थ
भूख हनुमान जी का शिष्ट बहाना है। उनका असली उद्देश्य, जो जल्दी ही स्पष्ट होता है, रावण के बल की थाह लेना और स्वयं को उसके सामने पहुँचाना है।
श्लोक 17.5
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥ ५ ॥
tinha kara bhaya mātā mohi nāhīṁ jauṁ tumha sukha mānahu mana māhīṁ
हिंदी अर्थ
"माता! यदि आप मन में प्रसन्न हों, तो मुझे उनका कोई डर नहीं।"
श्लोक 17.6
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥ १७ ॥
dekhi buddhi bala nipuna kapi kaheu jānakīṁ jāhu
raghupati charana hṛidayam̐ dhari tāta madhura phala khāhu
हिंदी अर्थ
कपि को बुद्धि और बल में निपुण देखकर जानकी जी ने कहा, "जाओ, हे तात! श्री रघुनाथ जी के चरणों को हृदय में धारण करके मीठे फल खाओ।"