श्लोक 22.1
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥ १ ॥
jānaum̐ maiṁ tumhāri prabhutāī sahasabāhu sana parī larāī
samara bāli sana kari jasu pāvā suni kapi bachana bihasi biharāvā
हिंदी अर्थ
"मैं तुम्हारी प्रभुता जानता हूँ। सहस्रबाहु से तुम्हारी लड़ाई हुई थी, और बालि से युद्ध करके तुमने यश पाया था।" कपि के वचन सुनकर रावण ने हँसकर बात टाल दी।
भावार्थ
यह तीखा व्यंग्य है। रावण ये दोनों लड़ाइयाँ हारा था: सहस्रबाहु कार्तवीर्य ने उसे बंदी बना लिया था, और बालि उसे काँख में दबाकर घूमता रहा। रावण हँसकर बात टाल देता है।
श्लोक 22.2
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥ २ ॥
khāyaum̐ phala prabhu lāgī bhūm̐khā kapi subhāva teṁ toreum̐ rūkhā
saba keṁ deha parama priya svāmī mārahiṁ mohi kumāraga gāmī
हिंदी अर्थ
"हे स्वामी! भूख लगी थी इसलिए फल खाए, और वानर स्वभाव से पेड़ तोड़े। हे स्वामी! सबको अपना शरीर सबसे प्यारा होता है। कुमार्ग पर चलने वाले वे मुझे मारने लगे,
श्लोक 22.3
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥ ३ ॥
jinha mohi mārā te maiṁ māre tehi para bām̐dheum̐ tanayam̐ tumhāre
mohi na kachhu bām̐dhe kai lājā kīnha chahaum̐ nija prabhu kara kājā
हिंदी अर्थ
"तो जिन्होंने मुझे मारा, उन्हें मैंने मारा। उस पर तुम्हारे पुत्र ने मुझे बाँध लिया। पर मुझे बँधने की कोई लाज नहीं, मैं तो अपने प्रभु का काम करना चाहता हूँ।
श्लोक 22.4
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥ ४ ॥
binatī karaum̐ jori kara rāvana sunahu māna taji mora sikhāvana
dekhahu tumha nija kulahi bichārī bhrama taji bhajahu bhagata bhaya hārī
हिंदी अर्थ
"हे रावण! मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ, अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनो। अपने कुल का विचार करके देखो, और भ्रम छोड़कर भक्तों का भय हरने वाले भगवान को भजो।
भावार्थ
रावण को लज्जित करने के तुरंत बाद हनुमान जी हाथ जोड़कर विनती करते हैं। पूरे दृश्य में वे केवल योद्धा नहीं, युद्ध टालने की कोशिश करने वाले दूत हैं।
श्लोक 22.5
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥ ५ ॥
jākeṁ ḍara ati kāla ḍerāī jo sura asura charāchara khāī
tāsoṁ bayaru kabahum̐ nahiṁ kījai more kaheṁ jānakī dījai
हिंदी अर्थ
"जिनके डर से वह काल भी बहुत डरता है जो देवता, दैत्य और सारे चराचर को खा जाता है, उनसे कभी वैर मत करो। मेरे कहने से जानकी जी को लौटा दो।"
श्लोक 22.6
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥ २२ ॥
pranatapāla raghunāyaka karunā siṁdhu kharāri
gaem̐ sarana prabhu rākhihaiṁ tava aparādha bisāri
हिंदी अर्थ
"शरणागतों के रक्षक, करुणा के सागर, खर के शत्रु श्री रघुनाथ जी शरण में जाने पर तुम्हारे अपराध भुलाकर तुम्हारी रक्षा करेंगे।"
भावार्थ
यह वचन दोहा 43–48 में विभीषण के शरणागत होने का पूर्व-संकेत है। हनुमान जी रावण को जो प्रस्ताव देते हैं, वही विभीषण स्वीकार करेंगे।