Bhakti Arohan
ॐ

सुन्दरकाण्ड — दोहा 34

भक्ति का वरदान

दोहा 34: भक्ति का वरदान

हनुमान जी केवल अनपायिनी भक्ति माँगते हैं; राम वर देकर सेना को कूच का आदेश देते हैं।

श्लोक 34.1

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥ सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥ १ ॥

nātha bhagati ati sukhadāyanī dehu kṛipā kari anapāyanī suni prabhu parama sarala kapi bānī evamastu taba kaheu bhavānī

हिंदी अर्थ

"हे नाथ! कृपा करके मुझे अत्यंत सुख देने वाली अपनी अनपायिनी (कभी न छूटने वाली) भक्ति दीजिए।" हे भवानी! कपि की अत्यंत सरल वाणी सुनकर प्रभु ने कहा, "एवमस्तु (ऐसा ही हो)।"

भावार्थ

कोई भी पुरस्कार मिल सकता था, पर हनुमान जी अनपायिनी भक्ति माँगते हैं, जो कभी न छूटे। यही माँग तुलसीदास ने मंगलाचरण (0.2) में की थी।

श्लोक 34.2

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥ यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥ २ ॥

umā rāma subhāu jehiṁ jānā tāhi bhajanu taji bhāva na ānā yaha saṁbāda jāsu ura āvā raghupati charana bhagati soi pāvā

हिंदी अर्थ

"हे उमा! जिसने राम का स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर और कुछ अच्छा नहीं लगता। यह संवाद जिसके हृदय में आ गया, उसने श्री रघुनाथ जी के चरणों की भक्ति पा ली।"

भावार्थ

शिव जी यहाँ फलश्रुति कहते हैं, यानी सुनने का फल: राम और हनुमान के इस संवाद का फल स्वयं भक्ति है।

श्लोक 34.3

सुनि प्रभु बचन कहहिं कपि बृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥ तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥ ३ ॥

suni prabhu bachana kahahiṁ kapi bṛiṁdā jaya jaya jaya kṛipāla sukhakaṁdā taba raghupati kapipatihi bolāvā kahā chalaiṁ kara karahu banāvā

हिंदी अर्थ

प्रभु के वचन सुनकर वानरों के झुंड कहने लगे, "कृपालु, सुख के मूल की जय हो, जय हो, जय हो!" तब श्री रघुनाथ जी ने कपिराज सुग्रीव को बुलाकर कहा, "चलने की तैयारी करो।

श्लोक 34.4

अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे॥ कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥ ४ ॥

aba bilaṁbu kehi kārana kīje turata kapinha kahum̐ āyasu dīje kautuka dekhi sumana bahu baraṣhī nabha teṁ bhavana chale sura haraṣhī

हिंदी अर्थ

"अब देरी किस कारण की जाए? वानरों को तुरंत आज्ञा दो।" यह लीला देखकर देवताओं ने बहुत से फूल बरसाए और आकाश से प्रसन्न होकर अपने लोक को चले।

श्लोक 34.5

कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ। नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥ ३४ ॥

kapipati begi bolāe āe jūthapa jūtha nānā barana atula bala bānara bhālu barūtha

हिंदी अर्थ

कपिराज ने तुरंत बुलाया, और सेनापति अपनी टुकड़ियों के साथ आ गए। अनेक रंगों के, अतुलनीय बल वाले वानरों और भालुओं के झुंड आ पहुँचे।

विषय-सूची
  1. मंगलाचरण
  2. दोहा 1: समुद्र लाँघना
  3. दोहा 2: सुरसा की परीक्षा
  4. दोहा 3: लंका का प्रथम दर्शन
  5. दोहा 4: लंकिनी
  6. दोहा 5: महलों में खोज
  7. दोहा 6: विभीषण से भेंट
  8. दोहा 7: दाँतों के बीच जीभ
  9. दोहा 8: अशोक वाटिका में सीता
  10. दोहा 9: जुगनू और कमलिनी
  11. दोहा 10: चंद्रहास
  12. दोहा 11: त्रिजटा का स्वप्न
  13. दोहा 12: मुद्रिका का गिरना
  14. दोहा 13: हनुमान जी का प्रकट होना
  15. दोहा 14: क्या उन्होंने मुझे भुला दिया?
  16. दोहा 15: राम का संदेश
  17. दोहा 16: सुमेरु जैसा रूप
  18. दोहा 17: सीता जी का आशीर्वाद
  19. दोहा 18: वाटिका का विध्वंस
  20. दोहा 19: मेघनाद और ब्रह्मास्त्र
  21. दोहा 20: रावण की सभा में
  22. दोहा 21: किसके बल पर?
  23. दोहा 22: दूत की विनती
  24. दोहा 23: राम-विमुख संपत्ति
  25. दोहा 24: दूत का दंड
  26. दोहा 25: जलती पूँछ
  27. दोहा 26: लंका दहन
  28. दोहा 27: चूड़ामणि
  29. दोहा 28: वापसी
  30. दोहा 29: राम के सम्मुख
  31. दोहा 30: जाम्बवान का वर्णन
  32. दोहा 31: सीता जी के वचन
  33. दोहा 32: जिससे उऋण न हो सकें
  34. दोहा 33: सब आपका प्रताप
  35. दोहा 34: भक्ति का वरदान
  36. दोहा 35: सागर-तट की ओर कूच
  37. दोहा 36: मंदोदरी की विनती
  38. दोहा 37: चाटुकार मंत्री
  39. दोहा 38: विभीषण की सलाह
  40. दोहा 39: राम केवल राजा नहीं
  41. दोहा 40: सुमति और कुमति
  42. दोहा 41: विभीषण का निष्कासन
  43. दोहा 42: राम-चरणों की अभिलाषा
  44. दोहा 43: सुग्रीव का संदेह
  45. दोहा 44: शरणागति का प्रण
  46. दोहा 45: विभीषण राम के सम्मुख
  47. दोहा 46: आलिंगन
  48. दोहा 47: विभीषण की स्तुति
  49. दोहा 48: भक्त के लक्षण
  50. दोहा 49: विभीषण का राजतिलक
  51. दोहा 50: सागर कैसे पार हो
  52. दोहा 51: सागर के सम्मुख
  53. दोहा 52: दूत पकड़े गए
  54. दोहा 53: रावण के प्रश्न
  55. दोहा 54: शुक का वर्णन
  56. दोहा 55: स्वभाव से शूरवीर
  57. दोहा 56: लक्ष्मण जी का पत्र
  58. दोहा 57: भय बिनु होइ न प्रीति
  59. दोहा 58: अग्निबाण
  60. दोहा 59: समुद्र की शरण
  61. दोहा 60: नल-नील और समापन