Bhakti Arohan
ॐ

सुन्दरकाण्ड — दोहा 60

नल-नील और समापन

दोहा 60: नल-नील और समापन

समुद्र नल और नील से पुल बँधवाने का सुझाव देता है। तुलसीदास काण्ड सुनने के फल के साथ समापन करते हैं।

श्लोक 60.1

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥ तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥ १ ॥

nātha nīla nala kapi dvau bhāī larikāīṁ riṣhi āsiṣha pāī tinha keṁ parasa kiem̐ giri bhāre tarihahiṁ jaladhi pratāpa tumhāre

हिंदी अर्थ

"हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं, जिन्हें लड़कपन में ऋषि से आशीर्वाद मिला था। उनके छू देने से भारी-भारी पर्वत भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर जाएँगे।

भावार्थ

कथा है कि बचपन में नील और नल ऋषियों की वस्तुएँ पानी में फेंक देते थे, तो एक ऋषि ने उन्हें आशीर्वाद (या शाप) दिया कि उनकी फेंकी वस्तु तैरती रहेगी। वही शरारत सेतु बनाने का साधन बन जाती है।

श्लोक 60.2

मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥ एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥ २ ॥

maiṁ puni ura dhari prabhu prabhutāī karihaum̐ bala anumāna sahāī ehi bidhi nātha payodhi bam̐dhāia jehiṁ yaha sujasu loka tihum̐ gāia

हिंदी अर्थ

"मैं भी प्रभु की प्रभुता को हृदय में धारण करके अपने बल के अनुसार सहायता करूँगा। हे नाथ! इस प्रकार समुद्र पर पुल बँधवाइए, जिससे तीनों लोकों में आपका यह सुंदर यश गाया जाए।

भावार्थ

समुद्र सूखने के बजाय पुल बाँधने का सुझाव देता है, जिससे वह भी बचा रहे और राम का यश भी बढ़े। सबका भला होता है, और काण्ड विनाश पर नहीं, मेल पर समाप्त होता है।

श्लोक 60.3

एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥ सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥ ३ ॥

ehi sara mama uttara taṭa bāsī hatahu nātha khala nara agha rāsī suni kṛipāla sāgara mana pīrā turatahiṁ harī rāma ranadhīrā

हिंदी अर्थ

"हे नाथ! इस बाण से मेरे उत्तरी तट पर रहने वाले पाप के ढेर दुष्ट मनुष्यों को मार दीजिए।" कृपालु और रणधीर राम ने समुद्र के मन की पीड़ा सुनकर उसे तुरंत हर लिया।

भावार्थ

धनुष पर चढ़ाया बाण वापस नहीं लिया जा सकता, इसलिए समुद्र उसके लिए एक लक्ष्य बताता है। वाल्मीकि रामायण इस स्थान को द्रुमकुल्य बताती है; परंपरा में जहाँ बाण गिरा, वह स्थान मरुभूमि (मारवाड़) से जोड़ा जाता है।

श्लोक 60.4

देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥ सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥ ४ ॥

dekhi rāma bala pauruṣha bhārī haraṣhi payonidhi bhayau sukhārī sakala charita kahi prabhuhi sunāvā charana baṁdi pāthodhi sidhāvā

हिंदी अर्थ

राम का भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित और सुखी हुआ। उसने उन दुष्टों का सारा चरित्र प्रभु को कह सुनाया, फिर चरणों की वंदना करके चला गया।

श्लोक 60.5

निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ। यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गायऊ॥ सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना। तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥ १ ॥

nija bhavana gavaneu siṁdhu śhrīraghupatihi yaha mata bhāyaū yaha charita kali mala hara jathāmati dāsa tulasī gāyaū sukha bhavana saṁsaya samana davana biṣhāda raghupati guna ganā taji sakala āsa bharosa gāvahi sunahi saṁtata saṭha manā

हिंदी अर्थ

समुद्र अपने घर चला गया, श्री रघुनाथ जी को उसकी सलाह अच्छी लगी। कलियुग के पापों को हरने वाला यह चरित्र तुलसीदास ने अपनी बुद्धि के अनुसार गाया है। श्री रघुनाथ जी के गुण समूह सुख के धाम, संदेह का नाश करने वाले और विषाद का दमन करने वाले हैं। अरे मूर्ख मन! सब आशा-भरोसा छोड़कर निरंतर इन्हें गा और सुन।

भावार्थ

अंतिम छंद में तुलसीदास की छाप ("दास तुलसी") है, और यहाँ कथा से हटकर पाठक से बात होती है: कवि अपने ही मन को संबोधित करते हैं, और उसके माध्यम से हर उस व्यक्ति को जिसने यह काण्ड पढ़ा।

श्लोक 60.6

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान। सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥ ६० ॥

sakala sumaṁgala dāyaka raghunāyaka guna gāna sādara sunahiṁ te tarahiṁ bhava siṁdhu binā jalajāna

हिंदी अर्थ

श्री रघुनाथ जी का गुणगान सब सुंदर मंगलों को देने वाला है। जो इसे आदर सहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज़ के भवसागर को पार कर जाएँगे।

भावार्थ

काण्ड अपने अंतिम प्रसंग पर एक सुंदर संकेत के साथ समाप्त होता है: सेना को असली समुद्र पार करने के लिए पुल चाहिए, पर श्रोता केवल रामकथा सुनकर बिना किसी नाव के भवसागर पार कर जाता है। परंपरा में सुन्दरकाण्ड पाठ यहीं पूरा होता है, और प्रायः इसके बाद हनुमान जी की आरती होती है।

विषय-सूची
  1. मंगलाचरण
  2. दोहा 1: समुद्र लाँघना
  3. दोहा 2: सुरसा की परीक्षा
  4. दोहा 3: लंका का प्रथम दर्शन
  5. दोहा 4: लंकिनी
  6. दोहा 5: महलों में खोज
  7. दोहा 6: विभीषण से भेंट
  8. दोहा 7: दाँतों के बीच जीभ
  9. दोहा 8: अशोक वाटिका में सीता
  10. दोहा 9: जुगनू और कमलिनी
  11. दोहा 10: चंद्रहास
  12. दोहा 11: त्रिजटा का स्वप्न
  13. दोहा 12: मुद्रिका का गिरना
  14. दोहा 13: हनुमान जी का प्रकट होना
  15. दोहा 14: क्या उन्होंने मुझे भुला दिया?
  16. दोहा 15: राम का संदेश
  17. दोहा 16: सुमेरु जैसा रूप
  18. दोहा 17: सीता जी का आशीर्वाद
  19. दोहा 18: वाटिका का विध्वंस
  20. दोहा 19: मेघनाद और ब्रह्मास्त्र
  21. दोहा 20: रावण की सभा में
  22. दोहा 21: किसके बल पर?
  23. दोहा 22: दूत की विनती
  24. दोहा 23: राम-विमुख संपत्ति
  25. दोहा 24: दूत का दंड
  26. दोहा 25: जलती पूँछ
  27. दोहा 26: लंका दहन
  28. दोहा 27: चूड़ामणि
  29. दोहा 28: वापसी
  30. दोहा 29: राम के सम्मुख
  31. दोहा 30: जाम्बवान का वर्णन
  32. दोहा 31: सीता जी के वचन
  33. दोहा 32: जिससे उऋण न हो सकें
  34. दोहा 33: सब आपका प्रताप
  35. दोहा 34: भक्ति का वरदान
  36. दोहा 35: सागर-तट की ओर कूच
  37. दोहा 36: मंदोदरी की विनती
  38. दोहा 37: चाटुकार मंत्री
  39. दोहा 38: विभीषण की सलाह
  40. दोहा 39: राम केवल राजा नहीं
  41. दोहा 40: सुमति और कुमति
  42. दोहा 41: विभीषण का निष्कासन
  43. दोहा 42: राम-चरणों की अभिलाषा
  44. दोहा 43: सुग्रीव का संदेह
  45. दोहा 44: शरणागति का प्रण
  46. दोहा 45: विभीषण राम के सम्मुख
  47. दोहा 46: आलिंगन
  48. दोहा 47: विभीषण की स्तुति
  49. दोहा 48: भक्त के लक्षण
  50. दोहा 49: विभीषण का राजतिलक
  51. दोहा 50: सागर कैसे पार हो
  52. दोहा 51: सागर के सम्मुख
  53. दोहा 52: दूत पकड़े गए
  54. दोहा 53: रावण के प्रश्न
  55. दोहा 54: शुक का वर्णन
  56. दोहा 55: स्वभाव से शूरवीर
  57. दोहा 56: लक्ष्मण जी का पत्र
  58. दोहा 57: भय बिनु होइ न प्रीति
  59. दोहा 58: अग्निबाण
  60. दोहा 59: समुद्र की शरण
  61. दोहा 60: नल-नील और समापन