श्लोक 47.1
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥ १ ॥
taba lagi hṛidayam̐ basata khala nānā lobha moha machchhara mada mānā
jaba lagi ura na basata raghunāthā dhareṁ chāpa sāyaka kaṭi bhāthā
हिंदी अर्थ
"लोभ, मोह, मत्सर (डाह), मद और मान, ये अनेक दुष्ट तभी तक हृदय में बसते हैं, जब तक धनुष-बाण और कमर में तरकश धारण किए श्री रघुनाथ जी हृदय में नहीं बसते।
भावार्थ
विभीषण अपनी कथा को मन के भीतर पर लागू करते हैं। हृदय लंका जैसा है, जिसमें लोभ, मोह आदि राक्षस भरे हैं, जब तक धनुषधारी राम उसमें प्रवेश नहीं करते।
श्लोक 47.2
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥ २ ॥
mamatā taruna tamī am̐dhiārī rāga dveṣha ulūka sukhakārī
taba lagi basati jīva mana māhīṁ jaba lagi prabhu pratāpa rabi nāhīṁ
हिंदी अर्थ
"ममता पूरी अँधेरी रात है, जो राग-द्वेष रूपी उल्लुओं को सुख देने वाली है। वह तभी तक जीव के मन में रहती है, जब तक प्रभु का प्रताप रूपी सूर्य उदय नहीं होता।
भावार्थ
उल्लू की उपमा 45.4 से लौटती है, जहाँ विभीषण ने अपने राक्षसी स्वभाव की तुलना अंधकार प्रिय उल्लू से की थी। यहाँ अंधकार ममता है, और उल्लू राग और द्वेष।
श्लोक 47.3
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥ ३ ॥
aba maiṁ kusala miṭe bhaya bhāre dekhi rāma pada kamala tumhāre
tumha kṛipāla jā para anukūlā tāhi na byāpa tribidha bhava sūlā
हिंदी अर्थ
"हे राम! आपके चरणकमलों को देखकर अब मैं कुशल से हूँ, मेरे भारी भय मिट गए। हे कृपालु! आप जिस पर प्रसन्न होते हैं, उसे संसार के तीनों प्रकार के दुख नहीं सताते।
श्लोक 47.4
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥ ४ ॥
maiṁ nisichara ati adhama subhāū subha ācharanu kīnha nahiṁ kāū
jāsu rūpa muni dhyāna na āvā tehiṁ prabhu haraṣhi hṛidayam̐ mohi lāvā
हिंदी अर्थ
"मैं अत्यंत नीच स्वभाव का राक्षस हूँ, मैंने कभी शुभ आचरण नहीं किया। जिनका रूप मुनियों के ध्यान में भी नहीं आता, उन प्रभु ने हर्षित होकर मुझे हृदय से लगा लिया।
श्लोक 47.5
अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥ ४७ ॥
ahobhāgya mama amita ati rāma kṛipā sukha puṁja
dekheum̐ nayana biraṁchi siva sebya jugala pada kaṁja
हिंदी अर्थ
"हे कृपा और सुख के पुंज राम! मेरा अत्यंत असीम सौभाग्य है कि मैंने ब्रह्मा और शिव जी से सेवित दोनों चरणकमलों को अपनी आँखों से देखा।"