Bhakti Arohan
ॐ

सुन्दरकाण्ड — दोहा 11

त्रिजटा का स्वप्न

दोहा 11: त्रिजटा का स्वप्न

दयालु राक्षसी त्रिजटा लंका के जलने और रावण के विनाश का सपना सुनाती है, और पहरेदारिनें डर जाती हैं।

श्लोक 11.1

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥ सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥ १ ॥

trijaṭā nāma rāchchhasī ekā rāma charana rati nipuna bibekā sabanhau boli sunāesi sapanā sītahi sei karahu hita apanā

हिंदी अर्थ

त्रिजटा नाम की एक राक्षसी थी, जिसका राम के चरणों में प्रेम था और जो विवेक में निपुण थी। उसने सबको बुलाकर अपना सपना सुनाया और कहा, "सीता की सेवा करके अपना भला कर लो।

भावार्थ

पहरेदारिनों में त्रिजटा ही सीता जी की एकमात्र सखी है। विभीषण और लंकिनी की तरह वह भी दिखाती है कि लंका के भीतर भी भलाई मिल सकती है।

श्लोक 11.2

सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥ खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥ २ ॥

sapaneṁ bānara laṁkā jārī jātudhāna senā saba mārī khara ārūṛha nagana dasasīsā muṁḍita sira khaṁḍita bhuja bīsā

हिंदी अर्थ

"सपने में एक बानर ने लंका जला दी और राक्षसों की सारी सेना मार डाली। दशशीश नंगा होकर गधे पर सवार है, सिर मुँडे हुए हैं और बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं।

भावार्थ

नंगे, मुँडे सिर और गधे पर सवार होकर दक्षिण दिशा में जाना मृत्यु और अपमान के पारंपरिक अशुभ लक्षण थे। सपना लंका-दहन की भविष्यवाणी करता है, जो कुछ ही दिनों में हनुमान जी कर देते हैं।

श्लोक 11.3

एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥ नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥ ३ ॥

ehi bidhi so dachchhina disi jāī laṁkā manahum̐ bibhīṣhana pāī nagara phirī raghubīra dohāī taba prabhu sītā boli paṭhāī

हिंदी अर्थ

"इस दशा में वह दक्षिण दिशा को चला गया, और मानो लंका विभीषण को मिल गई। नगर में रघुवीर की दुहाई फिर गई, और तब प्रभु ने सीता को बुला भेजा।

श्लोक 11.4

यह सपना मैं कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥ तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥ ४ ॥

yaha sapanā maiṁ kahaum̐ pukārī hoihi satya gaem̐ dina chārī tāsu bachana suni te saba ḍarīṁ janakasutā ke charananhi parīṁ

हिंदी अर्थ

"मैं यह सपना पुकारकर कहती हूँ, चार दिन बीतते ही यह सच होगा।" उसकी बात सुनकर वे सब डर गईं और जानकी जी के चरणों में गिर पड़ीं।

श्लोक 11.5

जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच। मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥ ११ ॥

jaham̐ taham̐ gaīṁ sakala taba sītā kara mana socha māsa divasa bīteṁ mohi mārihi nisichara pocha

हिंदी अर्थ

तब सब जहाँ-तहाँ चली गईं, और सीता जी मन में सोचने लगीं, "महीना बीतने पर यह नीच राक्षस मुझे मार डालेगा।"

विषय-सूची
  1. मंगलाचरण
  2. दोहा 1: समुद्र लाँघना
  3. दोहा 2: सुरसा की परीक्षा
  4. दोहा 3: लंका का प्रथम दर्शन
  5. दोहा 4: लंकिनी
  6. दोहा 5: महलों में खोज
  7. दोहा 6: विभीषण से भेंट
  8. दोहा 7: दाँतों के बीच जीभ
  9. दोहा 8: अशोक वाटिका में सीता
  10. दोहा 9: जुगनू और कमलिनी
  11. दोहा 10: चंद्रहास
  12. दोहा 11: त्रिजटा का स्वप्न
  13. दोहा 12: मुद्रिका का गिरना
  14. दोहा 13: हनुमान जी का प्रकट होना
  15. दोहा 14: क्या उन्होंने मुझे भुला दिया?
  16. दोहा 15: राम का संदेश
  17. दोहा 16: सुमेरु जैसा रूप
  18. दोहा 17: सीता जी का आशीर्वाद
  19. दोहा 18: वाटिका का विध्वंस
  20. दोहा 19: मेघनाद और ब्रह्मास्त्र
  21. दोहा 20: रावण की सभा में
  22. दोहा 21: किसके बल पर?
  23. दोहा 22: दूत की विनती
  24. दोहा 23: राम-विमुख संपत्ति
  25. दोहा 24: दूत का दंड
  26. दोहा 25: जलती पूँछ
  27. दोहा 26: लंका दहन
  28. दोहा 27: चूड़ामणि
  29. दोहा 28: वापसी
  30. दोहा 29: राम के सम्मुख
  31. दोहा 30: जाम्बवान का वर्णन
  32. दोहा 31: सीता जी के वचन
  33. दोहा 32: जिससे उऋण न हो सकें
  34. दोहा 33: सब आपका प्रताप
  35. दोहा 34: भक्ति का वरदान
  36. दोहा 35: सागर-तट की ओर कूच
  37. दोहा 36: मंदोदरी की विनती
  38. दोहा 37: चाटुकार मंत्री
  39. दोहा 38: विभीषण की सलाह
  40. दोहा 39: राम केवल राजा नहीं
  41. दोहा 40: सुमति और कुमति
  42. दोहा 41: विभीषण का निष्कासन
  43. दोहा 42: राम-चरणों की अभिलाषा
  44. दोहा 43: सुग्रीव का संदेह
  45. दोहा 44: शरणागति का प्रण
  46. दोहा 45: विभीषण राम के सम्मुख
  47. दोहा 46: आलिंगन
  48. दोहा 47: विभीषण की स्तुति
  49. दोहा 48: भक्त के लक्षण
  50. दोहा 49: विभीषण का राजतिलक
  51. दोहा 50: सागर कैसे पार हो
  52. दोहा 51: सागर के सम्मुख
  53. दोहा 52: दूत पकड़े गए
  54. दोहा 53: रावण के प्रश्न
  55. दोहा 54: शुक का वर्णन
  56. दोहा 55: स्वभाव से शूरवीर
  57. दोहा 56: लक्ष्मण जी का पत्र
  58. दोहा 57: भय बिनु होइ न प्रीति
  59. दोहा 58: अग्निबाण
  60. दोहा 59: समुद्र की शरण
  61. दोहा 60: नल-नील और समापन