Bhakti Arohan
ॐ

सुन्दरकाण्ड — दोहा 31

सीता जी के वचन

दोहा 31: सीता जी के वचन

हनुमान जी राम को चूड़ामणि देते हैं और सीता जी का व्यथा भरा संदेश सुनाते हैं।

श्लोक 31.1

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्हीं। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥ नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥ १ ॥

chalata mohi chūṛāmani dīnhīṁ raghupati hṛidayam̐ lāi soi līnhī nātha jugala lochana bhari bārī bachana kahe kachhu janakakumārī

हिंदी अर्थ

"चलते समय उन्होंने मुझे यह चूड़ामणि दी।" श्री रघुनाथ जी ने उसे लेकर हृदय से लगा लिया। (हनुमान जी बोले) "हे नाथ! दोनों आँखों में आँसू भरकर जानकी जी ने कुछ वचन कहे:

श्लोक 31.2

अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥ मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी॥ २ ॥

anuja sameta gahehu prabhu charanā dīna baṁdhu pranatārati haranā mana krama bachana charana anurāgī kehiṁ aparādha nātha hauṁ tyāgī

हिंदी अर्थ

"'छोटे भाई सहित प्रभु के चरण पकड़कर कहना: आप दीनबंधु हैं, शरणागत का दुख हरने वाले हैं। मैं मन, कर्म और वचन से आपके चरणों की अनुरागिनी हूँ, फिर हे नाथ! किस अपराध से आपने मुझे त्याग दिया?

श्लोक 31.3

अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥ नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥ ३ ॥

avaguna eka mora maiṁ mānā bichhurata prāna na kīnha payānā nātha so nayananhi ko aparādhā nisarata prāna karahiṁ haṭhi bādhā

हिंदी अर्थ

"'मैं अपना एक अवगुण मानती हूँ कि आपसे बिछुड़ते ही प्राण नहीं निकल गए। पर हे नाथ! यह आँखों का अपराध है, जो निकलते प्राणों को हठपूर्वक रोक देती हैं।

भावार्थ

सीता जी अपने जीवित रहने को ही "अवगुण" बताती हैं, और फिर इसका दोष आँखों पर डालती हैं: वे राम को फिर देखना चाहती हैं, इसलिए प्राणों को जाने नहीं देतीं। यह दोहा 30 में हनुमान जी की "ताला" वाली उपमा का ही विस्तार है।

श्लोक 31.4

बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥ नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥ ४ ॥

biraha agini tanu tūla samīrā svāsa jarai chhana māhiṁ sarīrā nayana sravahiṁ jalu nija hita lāgī jaraiṁ na pāva deha birahāgī

हिंदी अर्थ

"'विरह अग्नि है, शरीर रुई है और श्वास पवन है, इस तरह शरीर क्षण भर में जल सकता है। पर आँखें अपने स्वार्थ के लिए आँसू बहाती हैं, इसलिए विरह की आग शरीर को जला नहीं पाती।'

भावार्थ

एक बारीक उपमा: आग, रुई और हवा हों तो तुरंत जल जाना चाहिए, पर आँसू आग बुझाते रहते हैं, क्योंकि आँखों को अब भी राम के दर्शन की आशा है।

श्लोक 31.5

सीता कै अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥ ५ ॥

sītā kai ati bipati bisālā binahiṁ kaheṁ bhali dīnadayālā

हिंदी अर्थ

"सीता जी की विपत्ति बहुत बड़ी है। हे दीनदयालु! उसे बिना कहे रहना ही अच्छा है।

श्लोक 31.6

निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति। बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥ ३१ ॥

nimiṣha nimiṣha karunānidhi jāhiṁ kalapa sama bīti begi chalia prabhu ānia bhuja bala khala dala jīti

हिंदी अर्थ

"हे करुणानिधान! उनका एक-एक पल कल्प के समान बीत रहा है। हे प्रभु! जल्दी चलिए और भुजाओं के बल से दुष्टों की सेना जीतकर उन्हें ले आइए।"

विषय-सूची
  1. मंगलाचरण
  2. दोहा 1: समुद्र लाँघना
  3. दोहा 2: सुरसा की परीक्षा
  4. दोहा 3: लंका का प्रथम दर्शन
  5. दोहा 4: लंकिनी
  6. दोहा 5: महलों में खोज
  7. दोहा 6: विभीषण से भेंट
  8. दोहा 7: दाँतों के बीच जीभ
  9. दोहा 8: अशोक वाटिका में सीता
  10. दोहा 9: जुगनू और कमलिनी
  11. दोहा 10: चंद्रहास
  12. दोहा 11: त्रिजटा का स्वप्न
  13. दोहा 12: मुद्रिका का गिरना
  14. दोहा 13: हनुमान जी का प्रकट होना
  15. दोहा 14: क्या उन्होंने मुझे भुला दिया?
  16. दोहा 15: राम का संदेश
  17. दोहा 16: सुमेरु जैसा रूप
  18. दोहा 17: सीता जी का आशीर्वाद
  19. दोहा 18: वाटिका का विध्वंस
  20. दोहा 19: मेघनाद और ब्रह्मास्त्र
  21. दोहा 20: रावण की सभा में
  22. दोहा 21: किसके बल पर?
  23. दोहा 22: दूत की विनती
  24. दोहा 23: राम-विमुख संपत्ति
  25. दोहा 24: दूत का दंड
  26. दोहा 25: जलती पूँछ
  27. दोहा 26: लंका दहन
  28. दोहा 27: चूड़ामणि
  29. दोहा 28: वापसी
  30. दोहा 29: राम के सम्मुख
  31. दोहा 30: जाम्बवान का वर्णन
  32. दोहा 31: सीता जी के वचन
  33. दोहा 32: जिससे उऋण न हो सकें
  34. दोहा 33: सब आपका प्रताप
  35. दोहा 34: भक्ति का वरदान
  36. दोहा 35: सागर-तट की ओर कूच
  37. दोहा 36: मंदोदरी की विनती
  38. दोहा 37: चाटुकार मंत्री
  39. दोहा 38: विभीषण की सलाह
  40. दोहा 39: राम केवल राजा नहीं
  41. दोहा 40: सुमति और कुमति
  42. दोहा 41: विभीषण का निष्कासन
  43. दोहा 42: राम-चरणों की अभिलाषा
  44. दोहा 43: सुग्रीव का संदेह
  45. दोहा 44: शरणागति का प्रण
  46. दोहा 45: विभीषण राम के सम्मुख
  47. दोहा 46: आलिंगन
  48. दोहा 47: विभीषण की स्तुति
  49. दोहा 48: भक्त के लक्षण
  50. दोहा 49: विभीषण का राजतिलक
  51. दोहा 50: सागर कैसे पार हो
  52. दोहा 51: सागर के सम्मुख
  53. दोहा 52: दूत पकड़े गए
  54. दोहा 53: रावण के प्रश्न
  55. दोहा 54: शुक का वर्णन
  56. दोहा 55: स्वभाव से शूरवीर
  57. दोहा 56: लक्ष्मण जी का पत्र
  58. दोहा 57: भय बिनु होइ न प्रीति
  59. दोहा 58: अग्निबाण
  60. दोहा 59: समुद्र की शरण
  61. दोहा 60: नल-नील और समापन