Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 5, श्लोक 78–80

देव्या दूतसंवाद

चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत् । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ७८-८० ॥

chitirūpeṇa yā kṛitsnametad vyāpya sthitā jagat namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

हिंदी अर्थ

जो चैतन्य रूप से इस सम्पूर्ण जगत को व्याप्त करके स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

भावार्थ

अंतिम त्रिपद: "चिति", शुद्ध चैतन्य, जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है। प्राणियों में रूपों (निद्रा, क्षुधा, श्रद्धा) से स्तुति उस एक चैतन्य तक उठती है जो उन सबके पीछे है।