Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 5, श्लोक 35–37

देव्या दूतसंवाद

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ३५-३७ ॥

yā devī sarvabhūteṣhu tṛiṣhṇārūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

हिंदी अर्थ

जो देवी सब प्राणियों में तृष्णा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

भावार्थ

"तृष्णा" का अर्थ प्यास भी है और लालसा भी। कामना भी, जिससे गीता सावधान करती है, यहाँ उनका अंश मानकर सम्मानित है। बात कामना की पूजा करने की नहीं, बल्कि यह देखने की है कि कुछ भी, जो हमें बाँधता है वह भी, उनसे अलग नहीं।