Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 5, श्लोक 100

देव्या दूतसंवाद

एवं दैत्येन्द्र रत्नानि समस्तान्याहृतानि ते । स्त्रीरत्नमेषा कल्याणी त्वया कस्मान्न गृह्यते ॥ १०० ॥

evaṁ daityendra ratnāni samastānyāhṛitāni te strīratnameṣhā kalyāṇī tvayā kasmānna gṛihyate

हिंदी अर्थ

दैत्यराज! इस प्रकार सब रत्न आपके पास लाए गए हैं। फिर इस कल्याणमयी स्त्रीरत्न को आप क्यों नहीं ले लेते?"

भावार्थ

लोभ का तर्क: सब कुछ ले लिया है, तो उन्हें भी क्यों नहीं? दिव्य को संपत्ति की तरह पाने की यही चेष्टा उनका नाश करेगी।