निशुम्भस्याब्धिजाताश्च समस्ता रत्नजातयः । वह्निरपि ददौ तुभ्यमग्निशौचे च वाससी ॥ ९९ ॥
niśhumbhasyābdhijātāśhcha samastā ratnajātayaḥ vahnirapi dadau tubhyamagniśhauche cha vāsasī
हिंदी अर्थ
समुद्र से उत्पन्न सब प्रकार के रत्न निशुम्भ के पास हैं, और अग्नि ने भी आपको अग्नि से शुद्ध किए दो वस्त्र दिए हैं।
भावार्थ
गीता प्रेस यहाँ "श्चापि" पाठान्तर बताता है।
