Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 4, श्लोक 25

शक्रादिस्तुति

प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे । भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि ॥ २५ ॥

prāchyāṁ rakṣha pratīchyāṁ cha chaṇḍike rakṣha dakṣhiṇe bhrāmaṇenātmaśhūlasya uttarasyāṁ tatheśhvari

हिंदी अर्थ

हे चण्डिके! पूर्व और पश्चिम में हमारी रक्षा कीजिए, दक्षिण में रक्षा कीजिए; और हे ईश्वरि! अपने शूल को घुमाकर उत्तर में भी रक्षा कीजिए।

भावार्थ

चारों दिशाओं में रक्षा, एक ढर्रा जिसे बाद के कवच स्तोत्र (जैसे देवी कवच) हर दिशा और शरीर के हर अंग तक फैलाते हैं।