Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 4, श्लोक 23

शक्रादिस्तुति

त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन त्रातं त्वया समरमूर्धनि तेऽपि हत्वा । नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्त मस्माकमुन्मदसुरारिभवं नमस्ते ॥ २३ ॥

trailokyametadakhilaṁ ripunāśhanena trātaṁ tvayā samaramūrdhani te’pi hatvā nītā divaṁ ripugaṇā bhayamapyapāsta masmākamunmadasurāribhavaṁ namaste

हिंदी अर्थ

शत्रुओं का नाश करके आपने इन सम्पूर्ण तीनों लोकों की रक्षा की है; युद्ध में उन्हें मारकर आपने उन शत्रुओं को भी स्वर्ग पहुँचाया है, और उन्मत्त देवशत्रुओं से हमारे भय को भी दूर किया है। आपको नमस्कार है।

भावार्थ

स्तुति का लंबे छंद वाला भाग एक सार से समाप्त होता है: संसार बच गया, शत्रु पवित्र हुए, देवताओं का भय दूर हुआ।