केनोपमा भवतु तेऽस्य पराक्रमस्य रूपं च शत्रुभयकार्यतिहारि कुत्र । चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता च दृष्टा त्वय्येव देवि वरदे भुवनत्रयेऽपि ॥ २२ ॥
kenopamā bhavatu te’sya parākramasya rūpaṁ cha śhatrubhayakāryatihāri kutra chitte kṛipā samaraniṣhṭhuratā cha dṛiṣhṭā tvayyeva devi varade bhuvanatraye’pi
हिंदी अर्थ
आपके इस पराक्रम की तुलना किससे हो? शत्रुओं को भय देने वाला और अत्यंत मनोहर ऐसा रूप और कहाँ है? हृदय में कृपा और युद्ध में निष्ठुरता, ये दोनों तीनों लोकों में केवल आपमें ही देखी गई हैं, हे वरदायिनी देवि।
भावार्थ
"चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता च" (हृदय में कृपा और युद्ध में निष्ठुरता): यह शायद पूरी सप्तशती में देवी का सबसे अच्छा एक-पंक्ति सार है।
