Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 4, श्लोक 19

शक्रादिस्तुति

दृष्ट्वैव किं न भवती प्रकरोति भस्म सर्वासुरानरिषु यत्प्रहिणोषि शस्त्रम् । लोकान् प्रयान्तु रिपवोऽपि हि शस्त्रपूता इत्थं मतिर्भवति तेष्वपि तेऽतिसाध्वी ॥ १९ ॥

dṛiṣhṭvaiva kiṁ na bhavatī prakaroti bhasma sarvāsurānariṣhu yatprahiṇoṣhi śhastram lokān prayāntu ripavo’pi hi śhastrapūtā itthaṁ matirbhavati teṣhvapi te’tisādhvī

हिंदी अर्थ

आप सब असुरों को दृष्टिमात्र से भस्म क्यों नहीं कर देतीं, बल्कि शत्रुओं पर शस्त्र चलाती हैं? "शत्रु भी मेरे शस्त्रों से पवित्र होकर उत्तम लोकों में जाएँ": उनके प्रति भी आपका ऐसा अत्यंत उत्तम विचार रहता है।

भावार्थ

देवता अपने ही प्रश्न का उत्तर देते हैं। वे दृष्टि से नष्ट कर सकती थीं, पर शस्त्र चुनती हैं क्योंकि उनके शस्त्र से मृत्यु एक आशीर्वाद है। "इत्थं मतिर्भवति तेष्वपि तेऽतिसाध्वी" (उनके प्रति भी आपका विचार अत्यंत उत्तम है)।