Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 4, श्लोक 18

शक्रादिस्तुति

एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम् । सङ्ग्राममृत्युमधिगम्य दिवं प्रयान्तु मत्वेति नूनमहितान् विनिहंसि देवि ॥ १८ ॥

ebhirhatairjagadupaiti sukhaṁ tathaite kurvantu nāma narakāya chirāya pāpam saṅgrāmamṛityumadhigamya divaṁ prayāntu matveti nūnamahitān vinihaṁsi devi

हिंदी अर्थ

"इनके मरने से संसार को सुख मिले; और भले ही इन्होंने चिरकाल तक नरक में रहने योग्य पाप किए हों, युद्ध में मृत्यु पाकर ये स्वर्ग जाएँ": निश्चय ही यही सोचकर आप शत्रुओं का वध करती हैं, हे देवि।

भावार्थ

एक उल्लेखनीय विचार: असुरों का वध स्वयं करुणा है। उनके हाथों मृत्यु उन्हें पवित्र करके स्वर्ग भेजती है। देवी की दया उनके शत्रुओं तक भी पहुँचती है।