Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 4, श्लोक 17

शक्रादिस्तुति

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि । दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता ॥ १७ ॥

durge smṛitā harasi bhītimaśheṣhajantoḥ svasthaiḥ smṛitā matimatīva śhubhāṁ dadāsi dāridryaduḥkhabhayahāriṇi kā tvadanyā sarvopakārakaraṇāya sadā’’rdrachittā

हिंदी अर्थ

हे दुर्गे! स्मरण करने पर आप सब प्राणियों का भय हर लेती हैं, और स्वस्थ चित्त से चिंतन करने पर परम कल्याणमयी बुद्धि देती हैं। दरिद्रता, दुःख और भय हरने वाली देवि! आपके सिवा और कौन है जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिए सदा दयार्द्र रहता हो?

भावार्थ

"दुर्गे स्मृता हरसि भीतिम्" (हे दुर्गे! स्मरण करने पर आप भय हर लेती हैं) सप्तशती के सबसे अधिक पाठ किए जाने वाले श्लोकों में से है, जिसका प्रायः रक्षा के लिए अलग से जप किया जाता है। केवल उनका स्मरण ही पर्याप्त है।