Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 4, श्लोक 15

शक्रादिस्तुति

ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः । धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना ॥ १५ ॥

te sammatā janapadeṣhu dhanāni teṣhāṁ teṣhāṁ yaśhāṁsi na cha sīdati dharmavargaḥ dhanyāsta eva nibhṛitātmajabhṛityadārā yeṣhāṁ sadābhyudayadā bhavatī prasannā

हिंदी अर्थ

सदा अभ्युदय देने वाली आप जिन पर प्रसन्न रहती हैं, वही देश में सम्मानित हैं, उन्हीं को धन और यश मिलता है, उन्हीं का धर्म कभी शिथिल नहीं होता, और वही अपने सुखी स्त्री, पुत्र और सेवकों के साथ धन्य हैं।

भावार्थ

स्तुति अब दैनिक जीवन में उनकी कृपा के फलों का वर्णन करती है। गीता प्रेस यहाँ "धर्मवर्गः" पढ़ता है, जबकि कुछ संस्करणों में "बन्धुवर्गः" (अपने स्वजन) है।