Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 4, श्लोक 14

शक्रादिस्तुति

देवि प्रसीद परमा भवती भवाय सद्यो विनाशयसि कोपवती कुलानि । विज्ञातमेतदधुनैव यदस्तमेत न्नीतं बलं सुविपुलं महिषासुरस्य ॥ १४ ॥

devi prasīda paramā bhavatī bhavāya sadyo vināśhayasi kopavatī kulāni vijñātametadadhunaiva yadastameta nnītaṁ balaṁ suvipulaṁ mahiṣhāsurasya

हिंदी अर्थ

हे देवि! प्रसन्न होइए। आप प्रसन्न होने पर जगत के कल्याण के लिए परम हैं, और क्रोधित होने पर तुरंत ही कुलों का नाश कर देती हैं। यह अभी-अभी अनुभव में आया है, क्योंकि महिषासुर की विशाल सेना नष्ट हो गई है।

भावार्थ

"देवि प्रसीद" (प्रसन्न होइए): यह गीता के विश्वरूप दर्शन में अर्जुन की टेक है (गीता 11.25, 31, 45)। दिव्य शक्ति को प्रकट होते देखकर देवता और वीर दोनों कृपा की याचना करते हैं।