दृष्ट्वा तु देवि कुपितं भ्रुकुटीकराल मुद्यच्छशाङ्कसदृशच्छवि यन्न सद्यः । प्राणान्मुमोच महिषस्तदतीव चित्रं कैर्जीव्यते हि कुपितान्तकदर्शनेन ॥ १३ ॥
dṛiṣhṭvā tu devi kupitaṁ bhrukuṭīkarāla mudyachchhaśhāṅkasadṛiśhachchhavi yanna sadyaḥ prāṇānmumocha mahiṣhastadatīva chitraṁ kairjīvyate hi kupitāntakadarśhanena
हिंदी अर्थ
और उदयकाल के चन्द्रमा जैसा लाल और तनी भौंहों से विकराल आपका क्रुद्ध मुख देखकर महिष ने जो तुरंत प्राण नहीं छोड़े, यह और भी आश्चर्य की बात है; क्योंकि क्रोधित यमराज को देखकर कौन जीवित रह सकता है?
भावार्थ
दोनों श्लोक एक जोड़ी हैं: पहला उनके सौंदर्य के सामने क्रोध पर आश्चर्य करता है, दूसरा उनके कोप के सामने जीवित रहने पर।
