Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 4, श्लोक 12

शक्रादिस्तुति

ईषत्सहासममलं परिपूर्णचन्द्र बिम्बानुकारि कनकोत्तमकान्तिकान्तम् । अत्यद्भुतं प्रहृतमात्तरुषा तथापि वक्त्रं विलोक्य सहसा महिषासुरेण ॥ १२ ॥

īṣhatsahāsamamalaṁ paripūrṇachandra bimbānukāri kanakottamakāntikāntam atyadbhutaṁ prahṛitamāttaruṣhā tathāpi vaktraṁ vilokya sahasā mahiṣhāsureṇa

हिंदी अर्थ

आपका मुख मंद मुस्कान से युक्त, निर्मल, पूर्ण चन्द्रमा के बिंब जैसा और उत्तम सुवर्ण की कांति से मनोहर है; फिर भी उसे देखकर महिषासुर को क्रोध आया और उसने सहसा प्रहार कर दिया, यह बड़े आश्चर्य की बात है।

भावार्थ

एक कोमल, लगभग विनोदपूर्ण श्लोक। देवता आश्चर्य करते हैं कि कोई ऐसे सुंदर मुख को देखकर क्रोध कैसे कर सकता है; यही असुर के मोह की गहराई है।