मेधासि देवि विदिताखिलशास्त्रसारा दुर्गासि दुर्गभवसागरनौरसङ्गा । श्रीः कैटभारिहृदयैककृताधिवासा गौरी त्वमेव शशिमौलिकृतप्रतिष्ठा ॥ ११ ॥
medhāsi devi viditākhilaśhāstrasārā durgāsi durgabhavasāgaranaurasaṅgā śhrīḥ kaiṭabhārihṛidayaikakṛitādhivāsā gaurī tvameva śhaśhimaulikṛitapratiṣhṭhā
हिंदी अर्थ
जिससे सब शास्त्रों का सार जाना जाता है, वह मेधा आप ही हैं; दुर्गम भवसागर से पार कराने वाली नौका, आसक्ति रहित दुर्गा आप ही हैं; कैटभ के शत्रु विष्णु के हृदय में एकमात्र निवास करने वाली लक्ष्मी, और चन्द्रशेखर शिव द्वारा प्रतिष्ठित गौरी भी आप ही हैं।
भावार्थ
यह श्लोक देवियों को एक करता है: मेधा (सरस्वती जैसी बुद्धि), दुर्गा, श्री (विष्णु की पत्नी लक्ष्मी) और गौरी (शिव की पत्नी पार्वती)। ये सब एक ही देवी हैं। "दुर्गा" नाम की व्याख्या यहाँ "दुर्ग" (दुर्गम भवसागर) से पार कराने वाली नौका के रूप में की गई है।
