Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 3, श्लोक 34

महिषासुरवध

ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमम् । पपौ पुनः पुनश्चैव जहासारुणलोचना ॥ ३४ ॥

tataḥ kruddhā jaganmātā chaṇḍikā pānamuttamam papau punaḥ punaśhchaiva jahāsāruṇalochanā

हिंदी अर्थ

तब क्रोधित जगन्माता चण्डिका बार-बार उत्तम पेय का पान करने लगीं और लाल आँखें करके हँसने लगीं।

भावार्थ

वे कुबेर के सदा भरे पात्र (2.30) से पान करती हैं। टीकाकार प्रायः इस पेय को प्रतीकात्मक रूप से दिव्य शक्ति के आनंद के रूप में पढ़ते हैं, साधारण मद के रूप में नहीं।