वज्रमिन्द्रः समुत्पाद्य कुलिशादमराधिपः । ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद् गजात् ॥ २२ ॥
vajramindraḥ samutpādya kuliśhādamarādhipaḥ dadau tasyai sahasrākṣho ghaṇṭāmairāvatād gajāt
हिंदी अर्थ
सहस्र नेत्रों वाले देवराज इन्द्र ने अपने वज्र से वज्र उत्पन्न करके दिया और ऐरावत हाथी का घंटा भी दिया।
भावार्थ
ऐरावत का घंटा देवी का घंटा बन जाता है, जिसकी ध्वनि 2.56 में असुरों को मूर्च्छित करती है। गीता प्रेस यहाँ "समुत्पाट्य" पाठान्तर बताता है।
