अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम् । ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम् ॥ १२ ॥
atīva tejasaḥ kūṭaṁ jvalantamiva parvatam dadṛiśhuste surāstatra jvālāvyāptadigantaram
हिंदी अर्थ
देवताओं ने वहाँ तेज का एक पुंज देखा, जो जलते हुए पर्वत के समान था और जिसकी ज्वालाएँ सब दिशाओं में फैली थीं।
भावार्थ
प्रकाश का जलता पर्वत: यह चित्र गीता के विश्वरूप (गीता 11.12 का "हज़ार सूर्यों का प्रकाश") की याद दिलाता है।
