Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 13, श्लोक 4

सुरथवैश्ययोर्वरप्रदान

मोह्यन्ते मोहिताश्चैव मोहमेष्यन्ति चापरे । तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीम् ॥ ४ ॥

mohyante mohitāśhchaiva mohameṣhyanti chāpare tāmupaihi mahārāja śharaṇaṁ parameśhvarīm

हिंदी अर्थ

मोहित होते हैं, मोहित हुए हैं और आगे भी मोहित होंगे। महाराज! तुम उन्हीं परमेश्वरी की शरण में जाओ।

भावार्थ

वर्तमान, भूत और भविष्य: कोई माया से परे नहीं। ऋषि की सलाह सरल है: "तामुपैहि शरणम्", उनकी शरण में जाओ।