Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 12, श्लोक 40

फलस्तुति

भवकाले नृणां सैव लक्ष्मीर्वृद्धिप्रदा गृहे । सैवाभावे तथाऽलक्ष्मीर्विनाशायोपजायते ॥ ४० ॥

bhavakāle nṛiṇāṁ saiva lakṣhmīrvṛiddhipradā gṛihe saivābhāve tathā’lakṣhmīrvināśhāyopajāyate

हिंदी अर्थ

मनुष्यों के अभ्युदय के समय वे ही घर में लक्ष्मी के रूप में स्थित होकर उन्नति देती हैं, और वे ही अभाव के समय दरिद्रता (अलक्ष्मी) बनकर विनाश का कारण होती हैं।

भावार्थ

दुर्भाग्य भी उन्हीं का भाग है। ग्रंथ संसार को अच्छी देवी और बुरी देवी में नहीं बाँटता।