Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 11, श्लोक 6

देव्याः स्तुति (नारायणी स्तुति)

विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु । त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः ॥ ६ ॥

vidyāḥ samastāstava devi bhedāḥ striyaḥ samastāḥ sakalā jagatsu tvayaikayā pūritamambayaitat kā te stutiḥ stavyaparā paroktiḥ

हिंदी अर्थ

देवि! सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न रूप हैं, और जगत की सब स्त्रियाँ भी। जगदम्बा! एकमात्र तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी क्या स्तुति हो सकती है? तुम तो स्तुति के योग्य सब वस्तुओं से परे और परा वाणी हो।

भावार्थ

"स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु": संसार की हर स्त्री देवी का रूप है। यह पंक्ति स्त्रियों के सम्मान और नवरात्रि में कन्या पूजन के शास्त्रीय आधार के रूप में प्रायः उद्धृत की जाती है।