त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया । सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः ॥ ५ ॥
tvaṁ vaiṣhṇavī śhaktiranantavīryā viśhvasya bījaṁ paramāsi māyā sammohitaṁ devi samastametat tvaṁ vai prasannā bhuvi muktihetuḥ
हिंदी अर्थ
तुम अनन्त बल वाली वैष्णवी शक्ति हो, इस विश्व की कारणभूता परा माया हो। देवि! तुमने इस समस्त जगत को मोहित कर रखा है; तुम ही प्रसन्न होने पर इस पृथ्वी पर मुक्ति का कारण बनती हो।
भावार्थ
वही दोहरी भूमिका जो अध्याय 1 में सुरथ को सिखाई गई थी: वे मोह से बाँधती हैं और अपनी कृपा से मुक्त करती हैं।
