Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 11, श्लोक 4

देव्याः स्तुति (नारायणी स्तुति)

आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि । अपां स्वरूपस्थितया त्वयैत दाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये ॥ ४ ॥

ādhārabhūtā jagatastvamekā mahīsvarūpeṇa yataḥ sthitāsi apāṁ svarūpasthitayā tvayaita dāpyāyate kṛitsnamalaṅghyavīrye

हिंदी अर्थ

तुम ही इस जगत का एकमात्र आधार हो, क्योंकि पृथ्वी के रूप में तुम्हारी ही स्थिति है। अलंघनीय पराक्रम वाली देवि! जल के रूप में स्थित होकर तुम ही सम्पूर्ण जगत को तृप्त करती हो।

भावार्थ

देवी को तत्त्वों से एक माना गया है: सबको धारण करने वाली पृथ्वी और सबको तृप्त करने वाला जल।