Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 11, श्लोक 3

देव्याः स्तुति (नारायणी स्तुति)

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य । प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥ ३ ॥

devi prapannārtihare prasīda prasīda mātarjagato’khilasya prasīda viśhveśhvari pāhi viśhvaṁ tvamīśhvarī devi charācharasya

हिंदी अर्थ

"शरणागत की पीड़ा हरने वाली देवि! प्रसन्न होओ। सम्पूर्ण जगत की माता! प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरि! प्रसन्न होओ, विश्व की रक्षा करो। देवि! तुम्हीं चर और अचर जगत की अधीश्वरी हो।

भावार्थ

"देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद": सप्तशती के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से एक, जो प्रायः शरण की प्रार्थना के रूप में अलग से भी पढ़ा जाता है। "प्रसीद" (प्रसन्न होओ) शब्द तीन बार दोहराया गया है।