देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम् । कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद् विकाशिवक्त्राब्जविकाशिताशाः ॥ २ ॥
devyā hate tatra mahāsurendre sendrāḥ surā vahnipurogamāstām kātyāyanīṁ tuṣhṭuvuriṣhṭalābhād vikāśhivaktrābjavikāśhitāśhāḥ
हिंदी अर्थ
देवी द्वारा वहाँ महादैत्यपति के मारे जाने पर इन्द्र सहित देवता अग्नि को आगे करके कात्यायनी देवी की स्तुति करने लगे; अभीष्ट की प्राप्ति से उनके मुखकमल खिल उठे थे और उनकी आभा से दिशाएँ जगमगा उठीं।
भावार्थ
अध्याय 11 नारायणी स्तुति है, देवताओं की तीसरी महान स्तुति, जो अंतिम विजय के बाद गाई गई। यहाँ अग्नि देवताओं के अगुआ हैं। गीता प्रेस इस श्लोक में दो पाठान्तर बताता है ("लम्भा॰" और "वक्त्रास्तु वि॰")। कुछ छपे संस्करणों में इस अध्याय का नाम "नारायणी स्तुति" है; गीता प्रेस इसे "देव्याः स्तुति" कहता है।
