Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 11, श्लोक 42

देव्याः स्तुति (नारायणी स्तुति)

नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा । ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी ॥ ४२ ॥

nandagopagṛihe jātā yaśhodāgarbhasambhavā tatastau nāśhayiṣhyāmi vindhyāchalanivāsinī

हिंदी अर्थ

तब मैं नन्दगोप के घर में यशोदा के गर्भ से जन्म लेकर, विन्ध्याचल में रहती हुई, उन दोनों असुरों का नाश करूँगी।

भावार्थ

यह योगमाया हैं, जो कृष्ण-जन्म की रात यशोदा की पुत्री के रूप में जन्मीं और बाद में विन्ध्यवासिनी के रूप में पूजी गईं। गीता प्रेस यहाँ "कुले" पाठान्तर बताता है।