Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 11, श्लोक 33

देव्याः स्तुति (नारायणी स्तुति)

विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम् । विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ॥ ३३ ॥

viśhveśhvari tvaṁ paripāsi viśhvaṁ viśhvātmikā dhārayasīti viśhvam viśhveśhavandyā bhavatī bhavanti viśhvāśhrayā ye tvayi bhaktinamrāḥ

हिंदी अर्थ

विश्वेश्वरि! तुम विश्व का पालन करती हो; विश्वरूपा हो, इसलिए सम्पूर्ण विश्व को धारण करती हो। तुम भगवान विश्वनाथ की भी वन्दनीया हो। जो भक्तिपूर्वक तुम्हारे सामने झुकते हैं, वे पूरे विश्व को आश्रय देने वाले बन जाते हैं।

भावार्थ

हर पंक्ति में "विश्व" शब्द पर शब्द-क्रीड़ा। गीता प्रेस "विश्वेश" को भगवान विश्वनाथ (शिव) मानता है।