Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 5, श्लोक 53–55

देव्या दूतसंवाद

या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५३-५५ ॥

yā devī sarvabhūteṣhu kāntirūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

हिंदी अर्थ

जो देवी सब प्राणियों में कांति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

भावार्थ

"कांति", प्रकाश या सौंदर्य: हर सुंदर वस्तु उन्हीं को प्रतिबिंबित करती है।