Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 5, श्लोक 44–46

देव्या दूतसंवाद

या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ४४-४६ ॥

yā devī sarvabhūteṣhu lajjārūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

हिंदी अर्थ

जो देवी सब प्राणियों में लज्जा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

भावार्थ

"लज्जा", संकोच या स्वस्थ शर्म: वह आंतरिक रोक जो हमें गलत करने से बचाती है।