Bhakti Arohan
ॐ

दुर्गा सप्तशती — अध्याय 4, श्लोक 7

शक्रादिस्तुति

हेतुः समस्तजगतां त्रिगुणापि दोषैर्न ज्ञायसे हरिहरादिभिरप्यपारा । सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूत मव्याकृता हि परमा प्रकृतिस्त्वमाद्या ॥ ७ ॥

hetuḥ samastajagatāṁ triguṇāpi doṣhairna jñāyase hariharādibhirapyapārā sarvāśhrayākhilamidaṁ jagadaṁśhabhūta mavyākṛitā hi paramā prakṛitistvamādyā

हिंदी अर्थ

आप सब जगतों का कारण हैं; तीनों गुणों वाली होकर भी आपमें उनके दोष नहीं दिखते; हरि, हर आदि भी आपका पार नहीं पाते। आप सबकी आश्रय हैं; यह सारा जगत आपका अंश है; आप ही आद्या, अव्याकृता परा प्रकृति हैं।

भावार्थ

एक दार्शनिक श्लोक: देवी में तीनों गुण (सत्त्व, रज, तम) हैं, फिर भी वे उनके दोषों से अछूती हैं, जैसे गीता 14.19 में परमात्मा का वर्णन है। सारा जगत उनका केवल एक अंश है।